(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 196 से 198 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 195 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझनेमें आसानी होगी।

धारा 196

इस धारा के अनुसार राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसे अपराध करने के लिए आपराधिक षडयंत्र के लिए अभियोजना के बारे मे बताया गया है।
इसके अनुसार जब

(1) कोई न्यायालय–

(क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 6 के अधीन या धारा 153क, ‘[धारा 295क या धारा 505 की उपधारा (1)] के अधीन दंडनीय किसी अपराध का — अथवा

(ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षडयंत्र का —- अथवा

(ग) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 108क में यथावर्णित किसी दुप्रेरण का, संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं।

(1क) जब  कोई न्यायालय-

(क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 153 या धारा 505 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अथवा

(ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षडयंत्र का, संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से ही करेगा अन्यथा नहीं।]

(2) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 120ब के अधीन दंडनीय किसी आपराधिक षडयंत्र के किसी ऐसे अपराध का जो मृत्यु आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय अपराध करने के आपराधिक षडयंत्र से भिन्न है, संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट ने कार्यवाही शुरू करने के लिए लिखित सम्मति नहीं दे दी है।

परंतु जहाँ आपराधिक षडयंत्र ऐसा है । जिसे धारा 195 के उपबंध लागू हैं वहां ऐसी कोई सम्मति आवश्यक न होगी।

(3) केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन मंजूरी देने के पूर्व और जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (1क) के अधीन मंजूरी देने से पूर्व और राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (2) के अधीन सम्मति देने के पूर्व, ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा जो निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का नहीं है।  तथा प्रारंभिक अन्वेषण किए जाने का आदेश दे सकता है । और उस दशा में ऐसे पुलिस अधिकारी की वे शक्तियां होंगी जो धारा 155 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट हैं।

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धारा 197

इस धारा के अनुसार यदि  जनता सेवक जज या मैजिस्ट्रेट या प्रशासनिक अधिकारी (Administration Officer) के  द्वारा कोई अपराध किया गया है।  और वह अपराध indian panel court के section 161A , 161B , 354 , 354A , 2354D , 370 , 376, 376A , 376B , 376C और 509 के अंदर आती है।

तो ऐसे अपराध के खिलाफ कोर्ट बिना किसी अनुमति के पब्लिक सर्वेंट के ऊपर संज्ञान ले सकती है। तथा  ऐसे अपराधों के लिए कोर्ट को राज्य सरकार या केंद्र की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

यानी कि अगर आप किसी भी पब्लिक सर्वेंट के द्वारा ऐसे अपराध के शिकार हुए हैं जो कि इन धाराओं के अंदर आती है। तो आप डायरेक्ट उनके ऊपर कोर्ट में शिकायत दर्ज करा सकते हैं और कोर्ट बिना किसी अनुमति के पब्लिक सर्वेंट के ऊपर संज्ञान ले सकती है।

धारा 197 (2) के अनुसार

कि अगर किसी सैनिक जो कि केंद्र सरकार के Armed Forces के किसी भी इकाई में नियुक्त हैं तो कोर्ट को उनके खिलाफ संज्ञान लेने के लिए केंद्र सरकार से धारा 194 के अनुसार ,  यानी कि केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होती है।

अगर किसी सैनिक के द्वारा कोई अपराध होता है और उस अपराध के खिलाफ केस मुकदमा दायर किया जाता है तो इस अपराध पर संज्ञान लेने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेती है केंद्र सरकार की अनुमति के बाद ही वह इस अपराध पर संज्ञान ले सकती हैं।

धारा 197  (3) के अनुसार
 इसके अनुसार  जो भी सैनिक या पुलिस राज्य के शांति व्यवस्था बनाए रखने में कार्य कर रहे हैं।  उनके लिए यह  प्रावधान लागू होता है। यानी अगर किसी पुलिस या सैनिक जो राज्य की शांति व्यवस्था बनाए रखने में कार्य कर रहे हैं उनके खिलाफ कोर्ट को संज्ञान लेने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है।

3क
इसमे यह कहा गया है कि अगर किसी राज्य में state emergency लगा हुआ है।  और उस राज्य की शांति व्यवस्था बनाए रखने के कार्य में जो सैनिक और पुलिस लगे हुए हैं । तो उनके द्वारा कोई अपराध होता है और कोर्ट को उनके खिलाफ संज्ञान लेने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होती है। इसमें राज्य सरकार की अनुमति की कोई मान्यता नहीं होती है।

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धारा 197  (4 ) के अनुसार
इसके अनुसार यदि   प्रशासनिक अधिकारी सैनिक जज और मजिस्ट्रेट के द्वारा कोई अपराध होता है । तो उनके खिलाफ कौन से लोग शिकायत दर्ज करा सकते हैं, केंद्र सरकार और राज्य सरकार कौन से कोर्ट को उनके खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति देते हैं।

धारा 198

इस धारा के अनुसार विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन को बताया  है। जिसके अनुसार —

(1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 20 के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा।  अन्यथा नहीं: परंतु

(क) जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है अथवा जड़ या पागल है।  अथवा रोग या अंग-शैथिल्य के कारण परिवाद करने के लिए असमर्थ है, या ऐसी स्त्री है जो स्थानीय रुड़ियों और रीतियों के अनुसार लोगों के सामने आने के लिए विवश नहीं की जानी चाहिए।  वहां उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय की इजाजत से परिवाद कर सकता है ;

(ख) जहाँ ऐसा व्यक्ति पति है,  और संघ के सशस्त्र बलों में से किसी में से ऐसी परिस्थितियों में सेवा कर रहा है जिनके बारे में उसके कमान आफिसर ने यह प्रमाणित किया है कि उनके कारण उसे परिवाद कर सकने के लिए अनुपस्थिति छुट्टी प्राप्त नहीं हो सकती, वहाँ उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार पति द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से परिवाद कर सकता है।

(ग) जहां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 494 या धारा 495] के अधीन दंडनीय अपराध से व्यथित व्यक्ति पत्नी है वहां उसकी ओर से उसके पिता, माता, भाई, बहिन, पुत्र या पुत्री या उसके पिता या माता के भाई या बहिन द्वारा [या न्यायालय की इजाजत से, किसी ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो उससे रक्त, विवाह या दत्तक द्वारा संबंधित है।  परिवाद किया जा सकता है।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, स्त्री के पति से भिन्न कोई व्यक्ति उक्त संहिता की धारा 497 या धारा 498 के अधीन दंडनीय अपराध से व्यथित नहीं समझा जाएगा।

परंतु पति की अनुपस्थिति में, कोई ऐसा व्यक्ति, जो उस समय जब ऐसा अपराध किया गया था ऐसी स्त्री के पति की ओर से उसकी देख-रेख कर रहा था उसकी ओर से न्यायालय की इजाजत से परिवाद कर सकता है।

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(3) जब उपधारा (1) के परंतुक के खंड (क) के अधीन आने वाले किसी मामले में अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति या पागल व्यक्ति की ओर से किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा परिवाद किया जाना है, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा अवयस्क या पागल के शरीर का संरक्षक नियुक्त या घोषित नहीं किया गया है, और न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसा कोई संरक्षक जो ऐसे नियुक्त या घोषित किया गया है तब न्यायालय इजाजत के लिए आवेदन मंजूर करने के पूर्व, ऐसे संरक्षक को सूचना दिलवाएगा और सुनवाई का उचित अवसर देगा।

(4) उपधारा (1) के परंतुक के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्राधिकार लिखित रूप में दिया जाएगा और, वह पति द्वारा हस्ताक्षरित या अन्यथा अनुप्रमाणित होगा, उसमें इस भाव का कथन होगा कि उसे उन अभिकथनों की जानकारी दे दी गई है जिनके आधार पर परिवाद किया जाना है और वह उसके कमान आफिसर द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित होगा, तथा उसके साथ उस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित इस भाव का प्रमाणपत्र होगा कि पति को स्वयं परिवाद करने के प्रयोजन के लिए अनुपस्थिति छुट्टी उस समय नहीं दी जा सकती है।

(5) किसी दस्तावेज के बारे में, जिसका ऐसा प्राधिकार होना तात्पर्यित है और जिससे उपधारा (4) के उपबंधों की पूर्ति होती है और किसी दस्तावेज के बारे में, जिसका उस उपधारा द्वारा अपेक्षित प्रमाणपत्र होना तात्पर्यित है, जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि वह असली है और उसे साक्ष्य में ग्रहण किया जाएगा।

(6) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376 के अधीन अपराध का संज्ञान, जहाँ ऐसा अपराध किसी पुरुष द्वारा [अठारह वर्ष से कम आयु की] अपनी ही पत्नी के साथ मैथुन करता है, उस दशा में न करेगा जब उस अपराध के किए जाने की तारीख से एक वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुका है।

(7) इस धारा के उपबंध किसी अपराध के दुप्रेरण या अपराध करने के प्रयत्न को ऐसे लागू होंगे, जैसे वे अपराध को लागू होते हैं।

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