भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा 24 से 30 तक का अध्ययन

Indian Evidence Act Section 24 to 30- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा 20 से 23 तक का अध्ययन  किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है।  तो यह आप के लिए लाभकारी होगा।  यदि आपने यह धाराएं  नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी।

धारा 24 –

इस धारा के अनुसार  उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक के प्रति  कार्यवाही में कब विसंगत होती है यह बताया गया है।
इसमे अभियुक्त व्यक्ति के द्वारा की गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में विसंगति हो जाती है  यदि उसके ऐसा  किए जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता हो कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध मे आरोप के बारे में वह ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन के  द्वारा कराई गई है । जो की प्राधिकार वाले व्यक्ति की ओर से दिया गया है।  और जिसको  न्यायालय के लिए पर्याप्त हो कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार पर यह निर्णय देती है कि उसके करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहियों के बारे में   कोई उसका फायदा उठाया या उसके कार्य से  किसी बुराई का परिवर्तन कर लेगा।

धारा 25 –

इस धारा के अनुसार पुलिस ऑफिसर के सामने दी ज्ञी  संस्वीकृति का साबित न किया जाना बताया गया है। इसमे यह बताया गया है की किसी पुलिस ऑफिसर से की गई कोई भी संस्वीकृति किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जाएगी।

धारा 26 –

इस धारा के अनुसार पुलिस की अभिरक्षा में हाते हुए अभियुक्त द्वारा की गई संस्वीकृति जो की  उसके विरुद्ध साबित न किया जा सके उसको बताया गया है।

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इसके अनुसार कोई भी संस्वीकृति जो किसी व्यक्ति ने उस समय ली हो जब वह पुलिस की अभिरक्षा में हो। और  ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध सादित न की जाएगी जब तक कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात् उपस्थिति में न की गई हो।

स्पष्टीकरण-

इस धारा में “मजिस्ट्रेट” के अंतर्गत फोर्ट सन्ट जार्ज की प्रेसीडेन्सी में  तथा अन्य मजिस्ट्रेट के कार्य निर्वहन करने वाला ग्रामणी में नहीं आता है, जब तक  कि वह ग्रामीण कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1882 (1882 का 10) के अधीन मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करने वाला मजिस्ट्रेट न हो।

धारा 27-

इस धारा के अनुसार अभियुक्त से प्राप्त जानकारी में से कितनी जानकारी साबित की जा सकेगी यह बताया गया है। इसके अनुसार  जब किसी भी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है।  कि वह किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के द्वारा  जो पुलिस अफसर की अभिरक्षा में हो, और उनके द्वारा प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है।  तब ऐसी जानकारी में से जो जानकारी जितनी  चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं जितनी एतद्द्वारा पता चले हुये तथ्य से स्पष्टतया सम्बन्धित की जा सकेगी।

धारा 28-

इस धारा के अनुसार  उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से पैदा हए किसी मन पर प्रभाव के दूर हो जाने के बाद  की गई संस्वीकृति सुसंगत है या नही इसको बताया गया है।

इस धारा के अनुसार यदि कोई ऐसे  संस्वीकृति जो की धारा 24 में निर्दिष्ट है। वह  न्यायालय की राय में उसके मन पर प्रभाव के कारण फ   जो ऐसी किसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से कारित हुआ है। ऐसे दशा मे वह पूर्णतः दूर हो जाने के पश्चात् की गई है। तो वह सुसंगत है।

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धारा 29-

इस धारा के अनुसार अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति का गुप्त रखने के वचन आदि के कारण विसंगत न हो  जाने को बताया गया है। यदि किसी  ऐसी संस्वीकृति जो की अन्यथा सुसंगत है।  तो वह केवल इसलिए कि वह गुप्त रखना की वह वचन के अधीन या उसे अभिप्राप्त करने के प्रयोजनार्थ अभियुक्त व्यक्ति से की गई प्रवंचना के परिणामस्वरूप या उस समय जबकि वह मत्त था उस समय  की गई थी।  अथवा इसलिए कि ऐसे प्रश्नों केजो की  चाहे उनका रूप कैसा ही क्यों न रहा हो उसके  उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नहीं था।  अथवा केवल इसलिए कि उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि ऐसी स्वीकृत  करने के लिए आबद्ध नहीं था और कि उसके विरुद्ध उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा तो ऐसे दशा मे वह  विसंगत नहीं हो जाती।

धारा 30-

इस धारा के अनुसार साबित संस्वीकृति को जो उसे करने वाले व्यक्ति तथा एक ही  के लिए संयुक्त रूप से विचार अन्य को प्रभावित करती है या फिर उसके विचार में लेना आदि को बताया गया है।  
इस धारा के अनुसार  एक से अधिक व्यक्ति एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचार है । तो ऐसे दशा मे  ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक के द्वारा अपने को और ऐसे व्यक्तियों में से किसी अन्य को प्रभावित करने वाली की गई संस्वीकृति को  यदि साबित किया जाता है। ऐसे दशा मे  न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को साबित करता है।  तब न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को ऐसे अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध तथा ऐसी संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध विचार में ले सकेगा।

स्पष्टीकरण- इस धारा में प्रयुक्त “अपराध” शब्द के अंतर्गत उस अपराध का दुष्प्रेरण या उसे रोकने का प्रयत्न आदि आता है।

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उदाहरण  राम  और श्याम को पवन  की हत्या के लिए संयुक्ततः विचार किया जाता है। यह साबित किया जाता है कि राम  ने कहा श्याम  और मैंने पवन  की हत्या की है। पवन  की हत्या करने के लिए राम  का विचार हो रहा है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य है कि पवन  की हत्या राम  और श्याम द्वारा की गई थी और यह कि श्याम ने कहा था कि राम और मैंने पवन  की हत्या की है ।”न्यायालय इस कथन को क के विरुद्ध विचारार्थ नहीं ले सकेगा, क्योंकि श्याम  संयुक्तः विचारित नहीं हो रहा है।

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