भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 67 से 72 (राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति- II) तक का वर्णन

Constitution of india- President Vice President II- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने राज्य के नीति निर्देशक तत्व का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ ली जिये जिससे आपको आगे की धराये समझने मे आसानी होगी।

अनुच्छेद 67

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है की उपराष्टपति की पदावधि क्या होगी।
उपराष्ट्रपति जिस दिन अपना पद ग्रहण करता है उस दिन की तारीख से पांच वर्ष तक की अवधि तक वह अपना पद धारण करेगा।
पर
उपराष्ट्रपति यदि कभी भी चाहे तो वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपने हस्ताक्षर सहित त्याग पत्र देते हुए वह अपने पद का कभी भी त्याग कर सकते है।
उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया गया हो। और लोक सभा उस बहुमत से सहमत है किंतु इस खंड के प्रयोजन के लिए कई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना देना अनिवार्य है।
उपराष्ट्रपति अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है ।

अनुच्छेद 68

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि उपराष्ट्रपति के पद जो कि रिक्ति हो गया है उसको भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति की पदावधि क्या होगी।
इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि यदि उपराष्ट्रपति की पदावधि जो कि समाप्ति हो जानी है उस पद को समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा।

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इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि उपराष्ट्रपति की मृत्यु हो जाने पर , पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन द्वारा रिक्ति होने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र किया जाएगा और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि अनुच्छेद 67 के उपबंधों के अधीन रहते हुए वह व्यक्ति अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण कर सकता है।

अनुच्छेद 69

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि उप राष्ट पति शपद कैसे लेता है। उसका पूरा विवरण इसमे समझाया गया है।
प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस नियमानुसार नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्रकार में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।
उदाहरण –
ईश्वर की शपथ लेता हूँ

\”मैं, अमुक ———————————कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ, श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा।”

अनुच्छेद 70

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कॄत्यों का निर्वहन–संसद् मे किस प्रकार होगी और ऐसी किसी आकस्मिकता में जो इस अध्याय में उपबंधित नहीं है वह राष्ट्रपति के कॄत्यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।

अनुच्छेद 71

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या उससे संबन्धित सभी शंकाओं और विवादों की जांच और उसका निश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा और उसका निश्चय अंतिम होगा।
यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया जाता है तो उसके द्वारा किया जाने वाला उस स्थित मे ओ उस समय चल रहा हो , राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन में उच्चतम न्यायालय के विनिश्चय की तारीख को या उससे पहले किए गए कार्य उस घोषणा के कारण ‍अधिमान्य नहीं होंगे।

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इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या उससे उत्पन्न किसी विषय का विनियमन संसद विधि द्वारा कर सकेगी।

राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में किसी व्यक्ति के निर्वाचन को उसे निर्वाचित करने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों में किसी भी कारण से विद्यमान किसी रिक्ति के आधार पर कोई प्रश्न नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 72

इस अनुच्छेद मे क्षमा दान को बताया गया है।

इस अनुच्छेद मे न्यायिक शक्ति के तहत अपराध के लिये दोषी करार दिये गए व्यक्ति को राष्ट्रपति क्षमा अर्थात् दंडादेश का निलंबन तथा प्राणदंड को स्थगित करना और राहत और माफ़ी प्रदान कर सकता है। ऐसे मामले मे जिनमें राष्ट्रपति के पास ऐसी शक्ति होती है। जो कि –
जिनमें राष्ट्रपति के पास ऐसी शक्ति होती है। जो किसंघीय विधि के विरुद्ध दंडित व्यक्ति के मामले मेंआदेश दे सकता है।
जिनमें राष्ट्रपति के पास ऐसी शक्ति होती है। जो किसैन्य न्यायालय द्वारा दंडित व्यक्ति के मामले मेंआदेश दे सकता है। ।
जिनमें राष्ट्रपति के पास ऐसी शक्ति होती है। जो किमृत्यदंड पाए हुए व्यक्ति के मामले मेंआदेश दे सकता है। ।

इसमे निम्न रूप मे परिवर्तित कर सकता है।

लघुकरण -सज़ा की प्रकृति को बदलना जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना।
परिहार – सज़ा की अवधिको बदलना जैसे 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में बदलना।
विराम – विशेष परिस्थितियों की वजह से सज़ा को कम करना आदि सामील है।
प्रविलंबन – किसी दंड को कुछ समय के लिये टालने की प्रक्रिया शामिल है।
क्षमा – पूर्णतः माफ़ कर देना शामिल है।

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इसमे कई धराये अब तक बता चुके है यदि आपने यह धराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धराये समझने मे आसानी होगी।

यदि आपको इन धाराओ को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है।या फिर आपको इन धाराओ मे कोई त्रुटि दिख रही है तो उसके सुधार हेतु भी आप अपने सुझाव भी भेज सकते है।

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