बिना क्षति के विधिक अधिकार का अति उल्लंघन

बिना क्षति के विधिक अधिकार का अति उलँघन -कोई व्यक्ति किसी कार्य को करने या न करने के लिए क्षति के लिए दोसी तभी ठहराया जाता है जब उसका कार्य ना करना उसका दायित्व हो॥ और ना करना उसका दोष हो इसी तरह से कार्य न करने पर जो नुकसान होगा उसका दायित्व भी उत्पन्न होगा। यानि की उस का कार्य करना कर्तव्य हो और कार्य को नहीं करना दोष होगा और  यह   अपकरत्या संबंधी ऐसे दायित्व जो कर्तव्य का उलँघन करने से उत्पन्न होता है जो प्राथमिक रूप से विधि द्वारा निश्चित होता है। 

अपक्रत्य दायित्व के सिद्धांत 2 प्रकार का होता है। 

बिना क्षति के विधिक अधिकार का उलँघन विधिक अधिकार के उलँघन किए बिना क्षति या नुकसान 

बिना क्षति के विधिक अधिकार का उलँघन 

विधिक क्षति बिना किसी नुकसान के होना इस सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति को कानूनी क्षति हुई है वह नुकसान का दावा कर सकता है चाहे वह वास्तव मे हुआ हो या नहीं। 

इसमे व्यक्ति के विधिक अधिकार का उलँघन होता है। 

इसमे वास्तविक हानि होना आवश्यक नहीं है। 

यदि किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का अतिलंघन हुआ है तो वह नुकसान प्राप्त करने का अधिकारी है भले ही उसे नुकसान ना हुआ हो। 
 अपक्रत्य विधि मे विद्वेष पूर्ण अभियोजन क्या होता है?विद्वेष पूर्ण अभियोजन – सभी व्यक्ति को विधि उपचार प्रदान करती है। वह अपने अधिकार के प्रयोग के लिए विधिक प्रक्रिया का प्रयोग करता है। वह सार्व जनिक प्रयोग के लिए भी हम विधिक प्रक्रिया का उपयोग करते हैं। 
यह तभी प्राप्त होता है जब दुर्भावना , घ्रणा,अनुचित उपयोग,आदि न हो और सद्भावना पूर्वक विधिक प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है। 
यदि कोई विधिक प्रक्रिया दुर्भावना घ्राणा आदि के साथ की जाती है तो यह विधिक प्रक्रिया का दुर्पयोग विद्वेष पूर्ण अभियोजन कहलाता है। 
उदाहरण के लिए आ और ब एक दूसरे के रिश्तेदार है और आ ब से बहुत जलता है। और उसकी ख्याति कम करने के लिए उसपर रुपये चोरी का आरोप लगा देता है। अब यह वादी को सिद्ध करना होगा यह विद्वेष पूर्ण अभियोजन कहलाता है। 
विद्वेष पूर्ण अभियोजन के आवश्यक तत्व निम्न है। प्रतिवादी द्वारा अभियोजनयह की प्रटवादी ने इसको किसी युक्ति और अधिसंभाव के कारण से आरंभ किया है। यह प्रतिवादी ने विद्वेष से कार्य किया है। दंडिक् कार्यवाही की समाप्ति वादी के दोषमुक्ति से हुई थी। अभियोजन के फलस्वरूप वादी को नुकसान हुआ। 

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कठोर पूर्ण दायित्व का सिद्धांत -अपक्रत्य विधि मे विद्वेष पूर्ण अभियोजन क्या होता है?

विद्वेष पूर्ण अभियोजन – सभी व्यक्ति को विधि उपचार प्रदान करती है। वह अपने अधिकार के प्रयोग के लिए विधिक प्रक्रिया का प्रयोग करता है। वह सार्व जनिक प्रयोग के लिए भी हम विधिक प्रक्रिया का उपयोग करते हैं।

यह तभी प्राप्त होता है जब दुर्भावना , घ्रणा,अनुचित उपयोग,आदि न हो और सद्भावना पूर्वक विधिक प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है।

यदि कोई विधिक प्रक्रिया दुर्भावना घ्राणा आदि के साथ की जाती है तो यह विधिक प्रक्रिया का दुर्पयोग विद्वेष पूर्ण अभियोजन कहलाता है।

उदाहरण के लिए आ और ब एक दूसरे के रिश्तेदार है और आ ब से बहुत जलता है। और उसकी ख्याति कम करने के लिए उसपर रुपये चोरी का आरोप लगा देता है। अब यह वादी को सिद्ध करना होगा यह विद्वेष पूर्ण अभियोजन कहलाता है।

विद्वेष पूर्ण अभियोजन के आवश्यक तत्व निम्न है।

प्रतिवादी द्वारा अभियोजन

यह की प्रटवादी ने इसको किसी युक्ति और अधिसंभाव के कारण से आरंभ किया है।

यह प्रतिवादी ने विद्वेष से कार्य किया है।

दंडिक् कार्यवाही की समाप्ति वादी के दोषमुक्ति से हुई थी।

अभियोजन के फलस्वरूप वादी को नुकसान हुआ।

राइलेण्ड बनाम फ्लेवेर 

इसको सबसे पहले इंगलेंड मे प्रतिपादित किया गया था। इस वाद मे सिद्धांत बताया गया है जिस वस्तु मे छूट निकालने से किसी अन्य व्यक्ति को परेसानी हो रही हो उसको अपनी भूमि पर एकट्ठा करने का कार्य प्रतिवादी अपने व्यक्तिगत दायित्व पर कर सकता है। 

यदि कोई व्यक्ति तलवार लेकर चल रहा है और दूसरा व्यक्ति लाठी ले कर चल रहा है तो वह धीरे धीरे चलेगा क्योंकि उसको तलवार वाले व्यक्ति से दर लगेगा। 

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इस प्रकार ही एक और उदाहरण है जिसमे रालण्ड अपनी मिल का पानी की सप्लाइ करने के लिए अपनी भूमि पर तालाब बना दिया और उसके लिए एक ठेकेदार को नियुक्त किया निर्माण के अंदर की सुरंग का संबंध पदोषी की फलीचर खान से थी ठेकेदार को यह ना पता था जिससे तालाब सुरंग का पानी सुरंग से होते हुए खान मे जा पहुचा जिससे खान मे पानी भर गया और बहुत नुकसान हुआ क्योंकि नुकसान उसके द्वरा जमीन मे सुरंग बनाने से हुआ इसलिए वह जिम्मेदार है। 

मिल मालिक को इस सिद्धांत पर उत्तरदायी माना क्योंकि “वह व्यक्ति जो अपने उद्देश्यों के लिए, अपनी भूमि पर कुछ ऐसा लाता है और उसे इकट्ठा करता है, जो यदि वहां से हट  कर जाये तो नुकसान/क्षति पहुँचाने की संभावना रखता है, तो उस व्यक्ति को ऐसी चीज़ को अपनी जिम्मेदारी पर रखना चाहिए  और इसका जबाब अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो सभी नुकसानों के लिए वह प्रथम दृष्टया जवाबदेह है, जो उस चीज़ के नहीं बताने या छुपा के रखने का स्वाभाविक परिणाम होगा।

एक और इसका उदाहरण है।जिसमे  सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के ओलियम गैस रिसाव मामले [एम. सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का फैसला करते हुए भारत जैसी औद्योगिक अर्थव्यवस्था में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए, ‘कठोर दायित्व सिद्धांत’ (Strict Liability Principle) को अपर्याप्त पाया था । तथा यह ‘पूर्ण दायित्व सिद्धांत’ (Absolute Liability Principle) के साथ बदल दिया था। 

इस मामले में यह देखा गया था कि ‘कठोर दायित्व’ सिद्धांत (Strict Liability Principle), कंपनियों को अपने दायित्वसे बचने के कई मौके प्रदान करता है, वहीँ पूर्ण दायित्व सिद्धांत, उन्हें बिना किसी बचाव या छूट के जवाबदेह बनाता है। 

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ओलियम लीक मामले के बाद से भारत में ‘पूर्ण दायित्व सिद्धांत’ (Absolute Liability Principle) ने कठोर दायित्व के सिद्धांत’ (Strict Liability Principle) को समाप्त करने की कोसिस की गई । 

प्रतिवादी के द्वारा कुछ अवस्था मे छूट प्राप्त की जा सकती है। प्रतिवादी द्वारा कुछ डिफेन्स (बचाव के आधार) लिए जा सकते हैं जिसके आधार पर वह कठोर दायित्व से बच सकता है। 

जैसे की एक उदाहरण 

इसके अनुसार , एक पक्ष तब उत्तरदायी नहीं होगा जब कोई खतरनाक पदार्थ, दुर्घटना से या अन्य परिस्थितियों में “एक्ट ऑफ गॉड” के चलते उसके परिसर से बाहर निकल जाए और लोगों को क्षति पहुंचाए। ऐसी परिस्थति में उसे पीड़ित पक्ष को मुआवजे का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसके अलावा, यदि क्षति या नुकसान, वादी की स्वयं की गलती से हुआ या उस नुकसान या क्षति या उसके परिणाम सहने के लिए वादी ने स्वयं सहमती  दी थी ।

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