भारतीय दंड संहिता धारा 199 से 205 तक का विस्तृत अध्ययन

IPC Section 199 to 205- Hindi Law Note

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे भारतीय दंड संहिता धारा 199 से 205 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की पोस्ट समझने मे आसानी होगी।

धारा 199-

इस धारा के अनुसार विधि के द्वारा साक्ष्य के रूप में लिये जाने योग्य घोषणा में किया गया मिथ्या कथन को बताया गया है।
लिए इसमे बताया गया है की जब किसी व्यक्ति दावरा कोई अपने द्वारा की गई या हस्ताक्षरित किसी घोषणा में जिसमे किसी तथ्य को साक्ष्य के रूप में लेने के लिए कोई न्यायालय, या कोई लोक सेवक या अन्य व्यक्ति विधि द्वारा आबद्ध या प्राधिकॄत हो तो कोई व्यक्ति जब कोई ऐसा कथन करेगा जिससे किसी ऐसी बात के संबध में या उस उद्देश्य के लिए तात्विक हो जिसके लिए वह घोषणा की जाए या उपयोग में लाई ज्ञी है जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है। या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है। वह उसी प्रकार दंडित किया जाएगा जैसे यदि उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो।

यह एक जमानतीऔर गैर-संज्ञेय अपराध है। और यह झूठे साक्ष्य देने के अपराध अनुसार विचारणीय है।

धारा 200-

भारतीय दंड संहिता की धारा 200 के अनुसार-
यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी घोषणा को करता है जो की यह जानते हुए कि वह किसी वस्तुगत अर्थ के संबंध में मिथ्या है। और वह उसको सच्ची घोषणा के रूप में भ्रष्टतापूर्वक उपयोग में लाता है। या उपयोग में लाने का प्रयत्न करता है। तो ऐसे घोषणा को और उस व्यक्ति को झूठा साक्ष्य देने के लिए दण्डित किया जाएगा ।

See Also  भारतीय दंड संहिता धारा 253 से 260 तक का विस्तृत अध्ययन

धारा 201-

भारतीय दंड संहिता की धारा 200 के अनुसार-
इस धारा मे यह बताया गया है की अपराध के सबूत का विलोपन या अपराधी को प्रतिष्ठित करने के लिए झूठी खबरफैलाना भी दंडनीय अपराध है।इसके अंतर्गत सबूत को मिटाया जाना भी इसमे दंडनीय अपराध बनाया गया है।और यदि इस प्रकार के अपराध के सबूत को मिटाया जाता है जिस अपराध का दंड मृत्युदंड है ।

तो इस स्थिति में सबूत मिटाने पर 7 वर्ष तक के दंड काप्रावधान है। और आजीवन कारावास से दंडित अपराध के सबूतों को यदि मिटाया जाता है तो इस धारा के अंतर्गत 3 वर्ष तक की अवधि के कारावास का प्रावधान है। इस धारा मे यह भी बताया गया है की इसके अंतर्गत 10 वर्ष से कम के दंडनीय अपराध के सबूतों को मिटाया जाना भी दंडनीय अपराध है। इस स्थिति में उतना कारावास होगा जितना कारावास उस अपराध के दंड का एक चौथाई भाग होता है।

धारा 202-

इस धारा मे बताया गया है की इत्तिला देने के लिए आबद्ध व्यक्ति द्वारा अपराध की इत्तिला देने का आशय का किसी कारण वश लोप –

यदि कोई व्यक्ति जो यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई अपराध किया गया है। तो उस अपराध के बारे में कोई इत्तिला जिसे देने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध हो। या इत्तिला देने का साशय लोप करेगा। तो वह व्यक्ति दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकती है। या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 256 से 260 तक का विस्तृत अध्ययन

धारा 203-

भारतीय दंड संहिता की धारा 203 के अनुसार-
जब कोई व्यक्ति यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई अपराध किया गया है उस अपराध के बारे में कोई ऐसी इत्तिला देगा। जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास हो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों सेदण्डित किया जा सकता है।

धारा 204-

भारतीय दंड संहिता की धारा 204 के अनुसार-
साक्ष्य के रूप में यदि किसी दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख का पेश किया जाता है। तो उसको निवारित करने के लिए उसको नष्ट करना आदि शामिल है।

जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख को छिपाता या नष्ट करता है। जिसे किसी न्यायालय में या ऐसी कार्यवाही में जो किसी लोक सेवक के समक्ष उसकी वैसी हैसियत में विधिपूर्वक की गई है। तो उसको साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए उसे विधिपूर्वक विवश किया जा सके।

या पूर्वोक्त न्यायालय या लोक सेवक के समक्ष साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने या उपयोग में लाए जाने से निवारित करने के आशय से, या उस प्रयोजन के लिए उस दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख को पेश करने को उसे विधिपूर्वक समनित या अपेक्षित किए जाने केबाद ऐसी संपूर्ण दस्तावेज़ को या उसके किसी भाग को मिटता है। या ऐसा कर देता है जो पढ़ा न जा सकेतो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

See Also  दंड प्रक्रिया संहिता धारा 23 से 28 तक का अध्ययन

धारा 205-

भारतीय दंड संहिता की धारा 205 के अनुसार-
इस धारा मे वाद या अभियोजन में किसी कार्य या कार्यवाही के प्रयोजन से मिथ्या प्रतिरूपण को बताया गया है –
जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का मिथ्या प्रतिरूपण करेगा और ऐसे धरे हुए रूप में किसी वाद या आपराधिक अभियोजन में कोई स्वीकृति या कथन करेगा या दावे की संस्वीकृति करेगा या कोई आदेशिका निकलवाएगा या जमानतदार या प्रतिभू बनाएगा या कोई भी अन्य कार्य करेगातो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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