विधि के स्रोत (source of law) कौन कौन से हैं? रूढ़ि (custom) पूर्व निर्णय (precedents)और विधायन (legislation) क्या होता है?

source of law- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे विधिशास्त्र संबंधी कई पोस्ट का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की पोस्ट  समझने मे आसानी होगी।

विधि के स्रोत से मतलब विधि की उत्पत्ति से है। विभिन्न विद्वानों ने विधि की उत्पत्ति को लेकर अपने अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए है। जैसे की प्राकृतिक विधि के विद्वानों ने विधि को ईस्वर की शक्ति माना है वही पर कुछ विद्वानों ने इसको मानवीय भी माना है। ऑस्टिन ने विधि को संप्रभु से उत्पन्न हुआ माना है। वही सामाजिक अर्थसस्तरियों ने इसकी उत्पत्ति लोक चेतना को माना है।

धर्म शास्त्रियों ने इसकी उत्पत्ति का स्त्रोत गीता बाइबल कुरान वेद आदि को माना है। इस प्रकार विधिशास्त्र के स्रोत को लेकर सबकी अपनी अपनी भावना है। परंतु विधि स्त्रोत के मुख्य अंग निम्न है।
रूढ़ि
पूर्व निर्णय
विधायन

रूढ़ि –
रूढ़ि ऐसी प्रथा को कहते है जो बहुत समय पहले से चली आ रही है। और बहुत पुरानी होने के कारण इसको विधि के रूप मे शामिल कर लिया गया है। ऐसी परम्पराएं जो लम्बे समय से समाज में प्रचलित होती हैं।  जिसको हम अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग किये बिना ही केवल इसलिये आचरण में लाते हैं क्योंकि वे पहले से चली आ रही हैं।  उन्हें रूढ़ि कहते हैं। ये रूढ़ियां किसी भी समाज के विकास में सहायक  होती हैं यदि इसका विकास के लिये बुद्धि-विवेकका प्रयोग किया जाये । इसमे  निरन्तर परिवर्तन आवश्यक है। समयानुकूल परिवर्तन के बिना विकास सम्भव  नहीं है और यह रूढ़ि मे भी लागू होता है।

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प्रक्रति के अनुसार रूढ़ि 2 प्रकार की होती है।
मानवीय रूढ़ि
अमानवीय रूढ़ि

सामण्ड के अनुसार-
 रूढ़ि ऐसे सिद्धांत की अभिव्यक्ति है। जिनको की   न्याय और लोकोपयोगिता के सिद्धांत के रूप में और राष्ट्रीय चेतना के अन्तर्गत स्वीकार कर लिया गया है।

हालैण्ड के अनुसार-
 रूढ़ि आचरण की वह प्रक्रिया है।  जिसका  पालन किया जाता है। और जिस प्रकार किसी घास के मैदान में पैरों के निशान  तैयार हो जाती है जब कई बार उस पर से लोग आते जाते रहते है तो  ठीक उसी प्रकार नित्य-प्रति के व्यवहारों के अनुकरण से प्रथा का जन्म होता है।

कार्टर के अनुसार –
समान परिस्थितियों में समस्त व्यक्तियों के कार्यों की एकरूपता को ‘रूढ़ि’ कहते हैं।

हेल्सबरी (Halsbury) के अनुसार-
रूढ़ि एक प्रकार का विशेष  नियम है जो वास्तविक या सम्भावित रूप से अनादि काल से विद्यमान है।  और जिसे एक विशिष्ट भू-क्षेत्र में विधि का बल प्राप्त हो गया है।जबकि वह वह नियम देश की सामान्य विधि के प्रतिकूल या असंगत ही क्यों न हो।

रूढ़ि के आवश्यक तत्व निम्न है।
प्राचीनता
निरंतरता
निश्चितता
सुसंगतता
युक्ति युक्तता
शांतिपूर्ण उपभोग
लोकनीति
बाध्यकारी बल

पूर्व निर्णय (precedents)-
पूर्व निर्णय से मतलब यहा पर भूतकालीन निर्णयों को मार्गदर्शक के रूप में अपनाते हुए भावी निर्णय को लागू करना होता है जिसमे  विधि के स्रोत के रूप में न्यायिक पूर्व-निर्णय का पर्याप्त महत्व है।पूर्व निर्णय को नजीर (Precedent) भी कहा जाता है।

सामण्ड के अनुसार –
पूर्व-निर्णय को  न्यायालय द्वारा दिया जाता है यह एक  ऐसा निर्णय है जिसमें विधि का कोई सिद्धांत निहित होता है। पूर्व-निर्णय में निहित सिद्धांत जो उसे प्राधिकारिक तत्व प्रदान करता है। तथा यह  विधिशास्त्रीय भाषा में ‘विनिश्चय-आधार’ कहलाता है। ऐसे कोई भी  ठोस निर्णय संबंधित पक्षकारों पर बन्धकारी प्रभाव रखते हैं । और  इन निर्णयों के आधार को विधि को एक स्वरूप प्रदान किया जाता है।

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जर्मी बेंथम के अनुसार-
  पूर्व-निर्णय को न्यायाधीशों द्वारा निर्मित नियम कहा है । जबकि ऑस्टिन  के नियमों को ‘न्यायपालिका की विधि’ माना गया है। ।

ब्लैक स्टोन  के अनुसार-
पूर्ववर्ती निर्णयों के प्रयोग द्वारा न्याय की तराजू संतुलित तथा स्थिर  रहती हैं।और  नये न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ विधि में एकाएक नवीन परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। । जब कोई बात पहले निश्चित नही होती है तो वह  न्यायिक पूर्व-निर्णय के द्वारा निश्चित हो जाती है। ब्लैकस्टोन के इस तर्क का समर्थन अमेरिकी विधिशास्त्री डॉ॰ कार्टर ने भी किया है।

कोक के अनुसार-
मोजेज़ पहला रिपोर्टर था जिसने की पूर्व-निर्णय को आधार प्रदान किया था।

पूर्व-निर्णय के सिद्धांत –
अगमातमक सिद्धांत
घोषणात्मक सिद्धांत
निर्णनात्मक सिद्धांत

विधायन –

विधि शास्त्र मे विधायन को एक महत्वपूर्ण स्रोत माना गया है इसमे विधि की शक्तियां निहित होती है। इसका तात्पर्य विधि के निर्माण से है। सभी देशो मे यह गतिशील अवधारणा के रूप मे माना गया है। यही वजह है की विधान को आज के युग का महत्वपूर्ण विधि का स्त्रोत माना गया है। विधायन को लिखित विधि के रूप मे भी माना गया है। विश्लेषणात्मक विद्वान यह मानते है की विधि केवल विधायन द्वारा ही बनाई जा सकती है।

विधानमंडल एक  अस्थिर पंजर के रूप में कानून का निर्माण करते हैं। और  इसका मुख्य कारण है कि कानून बनाते समय उनको इस बात का अनुमान नहीं होता है  कि आने वाले समय में संबंधित वास्तविक स्थिति किस प्रकार की  होगी। तथा   विधि निर्माण करने वाले संस्था में बैठेलोग कानून के ज्ञाता नहीं होते है।  इसीलिए भी  उनके द्वारा निर्मित कानून सामान्य प्रकृति के होते हैं।

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और   यह मूल विधियों से सुसंगत होते हैं । इसीलिए  भी विधान मंडल द्वारा इनको समर्थन भी मिला होता है इस कारण यह प्रत्यायोजित विधायन कहलाते हैं। यह अत्यंत लचीला होता है। और यह  परिस्थितियों के अनुसार ढल सकता है। इसमे  पीड़ित व्यक्ति एक दूसरे से बातचीत कर समस्या को सुलझा सकते है तथा इसमे उनकी विशेष समस्याओं को समझना और और हल करना आसान होता है।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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