भारतीय दंड संहिता धारा 215 से 220 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे भारतीय दंड संहिता धारा 214  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराये नही पढ़ी तो आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराये समझने मे आसानी होगी।

धारा 215

इस धारा के अनुसार चोरी की संपत्ति के वापस लेने में सहायता करने के लिए उपहार लेना जाना बताया गया है।
जो कोई किसी व्यक्ति की किसी ऐसी  संपत्ति के वापस करवाने मे  जिससे इस संहिता के अधीन दंडनीय किसी अपराध द्वारा वह व्यक्ति वंचित कर दिया गया हो।

ऐसे दशा मे उसकी  सहायता करने के बहाने या सहायता करने के बदले मे यदि कोई परितोषण लेगा या लेने का करार करेगा या लेने को सहमत  होता है तो वह जब तक कि अपनी शक्ति में के सब साधनों को अपराधी को पकड़वाने के लिए और अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के लिए उपयोग में न लाए
तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की दो वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

धारा 216

इस धारा के अनुसार ऐसे  अपराधी को संश्रय देनाशामिल है  जो अभिरक्षा से निकल भागा है।  या जिसको पकड़ने का आदेश दिया जा चुका है।
यदि कोई अपराध किया जा चुका है।  और इसकी जानकारी उस व्यक्ति को है या फिर उसको यह  विश्वास करने का कारण है  कि वह अपराधी है। और फिर भी उसको  वैध दंड से प्रतिच्छादित करने के आशय से संश्रय देगा या छिपाएगा तो वह दोषी होगा।

यदि छिपाया गया अपराधी का अपराध मृत्यु से दंडनीय हो तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की  पाँच वर्ष तक की हो सकती है ।  या फिर  जुर्माने से।  या दोनों प्रकार के किसी भी दंड से  दंडित किया जा सकता है।

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यदि छिपाया गया अपराध आजीवन कारावास से  दंडनीय हो तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की तीन वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

और यदि वह अपराध एक वर्ष तकके कारावास से दंडनीय हो  न कि दस वर्ष तक के कारावास से दंडनीय हो तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की दीर्घतम अवधि की एकचौथाई भाग तक की हो सकेगी या फिर जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

  इस धारा मे भारत “अपराध” के अंतर्गत कोई भी ऐसा कार्य या लोप भी आता है। जिसका कोई व्यक्ति भारत से बाहर दोषी होना अभिकथित हो। और  जो यदि वह भारत में उसका दोषी होता तो  इस  धारा के अधीन दंडनीय होता।  और हर एक ऐसा कार्य इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दंडनीय समझा जाएगा मानो अभियुक्त व्यक्ति उसे भारत में ही करने का दोषी था ।

इसका अपवाद पति या पत्नी द्वारा अपराधी को छिपाया गया शामिल नही किया जाता है।

धारा 217

इस धारा के अनुसार किसी  लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति के समपहरण से बचाने के आशय से विधि के निर्देश  की अवज्ञा करना शामिल होता है।

यदि कोई व्यक्ति  लोक सेवक होते हुए विधि के ऐसे किसीनिर्देश  जो लोकसेवक के आचरण  से संबन्धित हो जिसमे यह बतया गया हो की कैसे आचरण करना चाहिए। यह  जानते हुए भी   किसी व्यक्ति को वैध दंड से बचाने के आशय से या संभाव्यतः लोकसेवक उसको तद्द्वारा बचाएगा या फिर  यह जानते हुए उससे दंड की अपेक्षा जिससे वह दंडनीय है।  

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तद्द्वारा कम दंड दिलवाएगा या संभाव्य जानते हुए अथवा किसी संपत्ति को ऐसे समपहरण या किसी भार से जिसके लिए वह संपत्ति विधि के द्वारा दायित्व के अधीन है । उसको बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा तो ऐसे स्थित मे वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की दो वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

धारा 218

इस धारा के अनुसार जो कोई लोक सेवक होते हुए और ऐसे लोक सेवक के नाते कोई अभिलेख या अन्य लेख तैयार करने का भार रखते हुए उस अभिलेख या लेख को इस प्रकार तैयार करेगा  जिसे वह जानता है कि यह अशुद्ध है । और लोक को या किसी व्यक्ति को हानि या क्षति कारित करने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा कारित करेगा ।

अथवा किसी व्यक्ति को वैध दंड से बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा । या फिर  किसी संपत्ति को ऐसे समपहरण या अन्य भार से जिसके दायित्व के अधीन वह संपत्ति विधि के अनुसार है। उसको बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा या फिर बचाने का प्रयास करेगा तो ऐसे स्थित मे वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की तीन  वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

धारा 219

इस धारा के अनुसार लोक सेवक द्वारा भ्रष्टतापूर्वक  न्यायिक कार्यवाही में विधि के प्रतिकूल रिपोर्ट पेश करना शामिल होता है।
जो कोई लोक सेवक होते हुएभी  न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में कोई रिपोर्ट, आदेश, अधिमत या विनिश्चय, जिसका विधि के प्रतिकूल होना प्रतीत होता है। जो की  भ्रष्टतापूर्वक या विद्वेषपूर्वक  रिपोर्ट देगा, या सुनाएगा,  वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की सात  वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

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धारा 220

जो कोई व्यक्ति किसी ऐसे पद पर होते हुए जिससे व्यक्तियों को विचारण या परिरोध के लिए सुपुर्द करने का या व्यक्तियों को परिरोध में रखने का उसे वैध प्राधिकार हो। वह  किसी व्यक्ति को उस प्राधिकार के प्रयोग में यह जानते हुए भ्रष्टतापूर्वक या विद्वेषपूर्वक विचारण या परिरोध के लिए उसको  सुपुर्द करेगा या परिरोध में रखेगा कि ऐसा करने में वह विधि के प्रतिकूल कार्य कर रहा है। तो  वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जो की सात  वर्ष तक की हो सकती है ।  या जुर्माने से।  या दोनों से। दंडित किया जा सकता है।

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