भारतीय दंड संहिता धारा 292 तथा 293 तक का विस्तृत अध्ययन

IPC Section 292 and 293- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे भारतीय दंड संहिता धारा 291  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है।  यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी तो आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 292

इस धारा मे अश्लील पुस्तकों आदि का विक्रय को बताया गया है । जिसके अनुसार –

इसमे उपधारा (2) केअनुसार  किसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र रूपण, आकृति या अन्य  किसी वस्तु को अश्लील समझा जाएगा यदि वह कामोद्दीपक है या कामुक व्यक्तियों के लिए रुचिकर है।  या फिर  उसकी किसी मद का प्रभाव या  समग्र रूप से विचार करने पर ऐसा होता है जो उन व्यक्तियों को दुराचारी या भ्रष्ट बनाए जिनके द्वारा उसमें अन्तर्विष्ट या सन्निविष्ट विषय का पढ़ा जानाया फिर  देखा जाना या  फिर सुना जाना सभी सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सम्भाव्य है |

इस धारा के अनुसार  किसी अश्लील पुस्तक पुस्तिका, कागज, रेखाचित्र, रंगचित्र, रुपण या आकृति या किसी भी अन्य प्रकार की  अश्लील वस्तु को, चाहे वह कुछ भी होकिसी प्रकार से  बेचेगा या फिर उसको भाडे पर देगा या वितरित करेगा या फिर लोक प्रदर्शित करेगा या उसको किसी भी प्रकार प्रचालित करेगा या उसे विक्रयया  भाडे, वितरण लोक प्रदर्शन या परिचालन के प्रयोजनों के लिए रचेगा। या फिर उसको  उत्पादित करेगा।  या अपने कब्जे में रखेगा।  अथवा

किसी अश्लील वस्तु का आयात या निर्यात या प्रवहण पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के लिए करेगा या यह जानते हुएभी  या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि ऐसी वस्तु बेची जीएगी या भाडे पर दी जीएगी या  वितरित या लोक प्रदर्शित  किसी प्रकार से परिचालित की जाएगी अथवा

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 किसी ऐसे कारखार में भाग लेगा या उससे लाभ प्राप्त करेगा।  जिसमे वह  विश्वास करने का कारण रखता है कि कोई ऐसी अश्लील वस्तुएं पूर्वोक्त प्रयाजनों में से किसी प्रयोजन के लिए रची जातीहै या फिर  उत्पादित की जातीहै । या फिर  क्रय की जातीं है या फिर रखी जातीं है या फिर आयात की जातीहै । अथवा  निर्यात की जातीहै और उसका  प्रवहण की जातीहै ।  लोक प्रदर्शित की जाती या किसी भी प्राकर से परिचालित की जाती हैं।

अथवा

वह  यह विज्ञापित करेगा या किन्हीं साधनों के  द्वारा वे चाहे कुछ भी हों किसी प्रकार से यह ज्ञात कराएगा कि कोई व्यक्ति किसी ऐसे कार्य में जिस कार्य के द्वारा  जो इस धारा के अधीन अपराध है। उसमे  लगा हुआ है। या लगने के लिए तैयार हुआ है।  या यह कि कोई ऐसी अश्लील वस्तु किसी व्यक्ति से या किसी व्यक्ति के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

अथवा किसी भी ऐसे कार्य को जो इस धारा के अधीन अपराध माना जाता है उसको  करने की प्रस्थापना करेगा या करने का प्रयत्न करेगा। जो की  प्रथम दोषसिद्धि पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने सेजिसको की  जो दो हजार रुपए तक को हो सकेगा तथा द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की दशा में दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने  जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा उससे  दण्डित किया जाएगा |

 इस धारा का विस्तार निम्नलिखित पर न होगा यह अपवाद के रूप मे है। –

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(क) कोई ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, रूपण या आकृति के रूप मे जो कि –

 जिसका प्रकाशन लोकहित में होने के कारण इस आधार पर न्यायोचित साबित हो रहा हो कि ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, रुपण या आकृति विज्ञान, साहित्य, कला या विद्या या सर्वजन सम्बन्धी अन्य उद्देश्यों के हित में है। और उसका उपयोग लोक हित मे किया जा रहा है।

 जो सद्भावपूर्वक धार्मिक प्रयाजनों के लिए रखी या उपयोग में लाई गई पुस्तके हैं।

(ख) कोई ऐसा रूपण जो–

 प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958के अर्थ में प्राचीन संस्मारक पर या उसमें निहित किताब पर लगाई गई है।

किसी मंदिर पर या उसमें या मूर्तियों के प्रवहण के उपयोग में लाए जाने वाले या किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए रखे या उपयोग में लाए जाने वाले किसी रथ पर

तक्षित. उत्कीर्ण, रंगचित्रित या अन्यथा रुपित हों तो उनका प्रयोग इसके अंतर्गत आता है।

धारा 293

इस धारा के अनुसार जो कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को जो  बीस वर्ष से कम आयु का हो ,  ऐसी अश्लील वस्तु, जो अनतिम पूर्वगामी धारा में निर्दिष्ट है। यदि उसको  बेचेगा या फिर उसको  भाड़े पर देगा या फिर उसको  वितरण करेगा अथवा  प्रदर्शित करेगा या परिचालित करेगा या ऐसा करने की प्रस्थापना या प्रयत्न करेगा । तो उसको ऐसा करने पर प्रथम दोषसिद्धि होने पर उसको दोनों में से किसी भी भांति के कारावास सेजो की साधारण या कठोर हो सकता है और  जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकती है ।  

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और जुर्माने से जो की  दो हजार रुपए तक का हो सकेगाऔर यदि   द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की दशा सिद्ध होती है तो उसको दोनों में से किसी भांति के कारावास सेजो की  सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो की  जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा उस अनुसार  दण्डित किया जाएगा ।यह एक सनघेय अपराध है । तथा यह किसी भी मैजिस्ट्रैट के द्वारा विचारणीय होता है। इसमे पहले 3 साल की सजा तथा दोबारा 7 साल की सजा हो सकती है।

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