भारतीय दंड संहिता धारा 82 से 89 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे भारतीय दंड संहिता
धारा 81 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराये नही पढ़ी है
तो पहले आप उनको पढ़ ली जिये जिससे आपको आगे की धाराये समझने मे आसानी
होगी।

धारा 82

इस धारा मे यह बताया गया है कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार यह बताती है
कि 7 वर्ष से कम आयु के कार्य
कोई भी घटना या दुर्घटना जो 7 वर्ष के शिशु द्वारा किया गया है तो वह
अपराध नही होता है।
धारा 83
इसमे बताया गया है कि कोई व्यक्ति इसकी आयु 7 वर्ष से अधिक पर 12 वर्ष से
कम है तो उसके द्वारा किया गया कार्य उसके बुद्धि कि परिपक्वता पर निर्भर
करता है कि वह अपराध है कि नही।
यदि 7.7 वर्ष के व्यक्ति और वैसा ही अपराध 11  साल के बच्चे ने किया है
तो उतनी अपराध 7.7 वर्ष के व्यक्ति को नही दी जाएगी तो 11 वर्ष के
व्यक्ति को दी जाएगी। क्योंकि वह अपने परिणाम और निर्णय को नही जानता है।
उदाहरण –
यदि किसी बालक ने किसी के घर सिक्के कि चोरी कर लेता है और आकर माँ को दे
देता है और माँ उसको वापस कर देता है तो वह अपराध नही है वही यदि उसको
बेच देता है तो वह अपराध है यानि कि समझ बुद्धि और परिपक्वता के अनुसार
न्यायालय अपना निर्णय देती है।

धारा 84

विक्रत चित्त व्यक्ति के बारे मे बताता है यदि कोई पागल व्यक्ति कोई
कार्य कर रहा है पर उसके परिणाम को नही जानता है तो इस प्रकार का कार्य
अपराध नही माना जाएगा परंतु अपराध करते समय मानशिक स्थित क्या थी उस पर
भी निर्भर करता है और उसका आशय क्या है इस पर भी निर्भर करता है । यदि
किसी को पागलपन के दौरे आते है और उस समय कोई अपराध कर देता हैतो वह
अपराध नही माना जाएगा परंतु जिस समय वह कार्य किया उस समय पागलपन का दौरा
नही आया था तो उस समय उसको अपराध माना जाएगा क्योकि उस समय वह परिणाम को
जानता था इसलिए वह अपराधी होगा ।

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इसमे पागलपन 2 प्रकार से माना गया है।
विधि द्वारा पागलपन
चिकित्सक के द्वारा पागलपन
कोई व्यक्ति अपराध कर रहा है और वह पागलपन कि अवस्था मे था यह उस व्यक्ति
को साबित करना होगा ।

धारा 85

इस धारा मे यह बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के
विरुद्ध नशा मे कोई कार्य करता है जो आपराधिक है जिसको नही पता कि वह
क्या कर रहा है ऐसे मे उसको आपराधिक नही माना जाएगा।
कोई बात अपराध नही है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा कि जाति है जो मतयाता मे
होने के कारण उसकी प्रक्रति दोषपूर्ण या विधि विरुद्ध है वह जानने मे
असमर्थ हो जो उसकी मर्जी के बिना दिया गया हो।

धारा 86

इस धारा मे यह बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के
विरुद्ध नशा मे कोई कार्य करता है जो आपराधिक है और वह नशा उसने खुद किया
है जिसमे विशेस ज्ञान कि आवश्यकता नही है जहा कि कोई किया गया कार्य
अपराध नही होता जो बिना आशय के किया गया वह अपराध नही होता यदि उसका आशय
है तो वह आपराधिक होगा और ऐसा माना जाएगा जैसे उसने नशा न किया हो। वह उस
प्रकार ही दोषी होगा जैसे बिना नशा के किए गए कार्य के लिए दोषी होगा।

खुद से किया नशा मे किया गया अपराध वैसा ही माना जाएगा जैसे बिना मतयाता
के किया जाये जिसमे विशेष ज्ञान और आशय कि आवश्यकता नही होती । यदि कोई
कार्य आशय और ज्ञान के बिना किया गया तो वह अपराध नही है। कोई कार्य जो
उसने नशा मे किया गया तो इस प्रकार वह दायित्व के अधीन होगा तो ऐसा माना
जाएगा कि नशा मे भी उसको ज्ञान था।

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धारा 87

इस धारा मे यह बताया गया है कि ऐसा कोई कार्य जिसकी सम्मति कि गयी हो और
मृतु और घोर उप हति करने के लिए न किया गया हो पर उसकी संभावना हो सकती
है।
जैसे कि 2 व्यक्ति कुस्ती लड़ने के लिए तैयार है तो दोनों को पता है कि
कुस्ती लड़ने पर दोनों को चोट लग सकती है पर दोनों घोर उत्तपत्ति करने के
लिए स्वतंत्र नही है। तो यह अपराध नही माना जाएगा ।
जब किसी को नुकसान करने का इरादा नही होता है। जब किसी कि म्र्तु का आशय
न हो और जब उस व्यक्ति कि आयु 18 साल से अधिक हो और उस व्यक्ति कि सहमति
हो तो इस प्रकार के अपराध को अपराध नही माना जाएगा।

धारा 88

इस धारा मे यह बताया गया है कि किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्यक और
सद्भाव पूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत कारित करने का आशय नही है तो वह
अपराध नही माना जाता है।
जैसे किसी डॉक्टर ने किसी का ऑपरेशन किया तो डॉक्टर का आशय मरीज को जान
से मारने का नही है पर वह ऑपरेशन मे मर जाता है तो वह अपराध नही माना
जाता है।

धारा 89

इस धारा के अनुसार संरक्षक के द्वारा बच्चे के माता  पिता या कर्मचारी के
अधिकारी के द्वारा सहमति दी जा सकती है जो उस व्यक्ति के फायदे की हो तो
वह अपराध नही है। यदि कोई व्यक्ति बेहोश है या मदहोश है या बच्चा है तो
उन सब की तरफ से उनके संरक्षक सहमति दे सकता है। यह अपराध नही होगा । इस
धारा मे यह बताया गया है कि किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्यक और
सद्भाव पूर्वक किया गया कार्य जो उसके संरक्षक के द्वारा दी गयी सहमति है
तो वह अपराध नही माना जाएगा।

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जैसे किसी डॉक्टर ने किसी का ऑपरेशन किया तो डॉक्टर का आशय मरीज को जान
से मारने का नही है। और उसके संरक्षक के द्वारा ऑपरेशन करने की इजाजत मिल
जाता है।  पर वह ऑपरेशन मे मर जाता है तो वह अपराध नही माना जाता है।
भारतीय दंड संहिता की कई धराये अब तक बता चुके है यदि आपने यह धराये नही
पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धराये समझने मे
आसानी होगी।
यदि आपको इन धाराओ को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे
संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते
है।या फिर आपको इन धाराओ मे कोई त्रुटि दिख रही है तो उसके सुधार हेतु भी
आप अपने सुझाव भी भेज सकते है।

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