विधि शास्त्र के अनुसार विधिक अधिकार और दायित्व क्या होता है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह अपनी ज़िम्मेदारी समाज मे निभाता है।अधिकारों का व्यक्ति के जीवन मे बहुत बड़ा स्थान है।  क्योंकि अधिकारों के अभाव मे व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास सम्भव नही है। मानव के पूर्ण विकास के लिए स्वतंत्रता आवश्यक है।  तथा स्वतंत्रता का महत्व तभी है, जब मनुष्य उसका उपयोग कर सके एवं राज्य और समाज उसे मान्यता दें। जब स्वतंत्रता को राज्य की मान्यता मिल जाती है, तो वह अधिकार बन जाती है।

पर इसका यह अर्थ नही है कि अधिकारों की उत्पत्ति राज्य द्वारा होती है। वे तो समाज मे पैदा होते है,। राज्य तो सिर्फ उन्हें मान्यता प्रदान करता है।  और यह राज्य द्वारा प्राप्त अधिकार को विधि के द्वारा दिया जाता है।विधिक अधिकार  मनुष्य के  समाज मे समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है

विधिक अधिकार का अर्थ –

विधिक अधिकार वे हैं जो किसी दत्त विधिक प्रणाली द्वारा किसी व्यक्ति को प्रदान किये जाते हैं। अर्थात्, वे अधिकार जो विधि द्वारा और राज्य द्वारा  मानवीय नियमों द्वारा परिवर्तित, निरसित और निरुद्ध किये जा सकतेहै। यह राज्य द्वारा संरक्षित अधिकार है। 
अधिकार वह है जब किसी वस्तु को प्राप्त करने या किसी कार्य को संपादित करने के लिए उपलब्ध कराया गया हो या किसी व्यक्ति की कानूनसम्मत या संविदासम्मत सुविधा, दावा या विशेषाधिकार है। कानून द्वारा प्रदत्त सुविधाएँ अधिकारों की रक्षा करती हैं। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे के बिना संभव नहीं। जहाँ कानून अधिकारों को मान्यता देता है। वही इसका पालन न करने पर दंड का भी प्रावधान है।

लास्की. के अनुसार, “अधिकार, सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियां हैं जिनके बिना व्यक्ति सामान्य जीवन नही जी सकता है।

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ऑस्टिन और हॉलैंड के अनुसार विधिक अधिकार को इस प्रकार बताया गया है कि-
 इच्छा ही अधिकार का मुख्य तत्व है।  जिसका पोलाक और विनोग्रेडाफ भी समर्थन करते हैं।
 पुच्ता के अनुसार-
विधिक अधिकार किसी वस्तु पर शक्ति है।  जो इस अधिकार के माध्यम से उस व्यक्ति की उस व्यक्ति की इच्छा के अधीन किया जाता है जो उस अधिकार का उपभोगकर्ता है।

सामंड के अनुसार विधिक अधिकार-

विधिक अधिकार राज्य के नियम या विधि द्वारा मान्य और संरक्षित ऐसा हित है जिसका सम्मान करना कर्तव्य है और जिसकी अवहेलना करना एक दोषपूर्ति के लिए विधित: प्रत्याभूत शक्ति प्रतीत होता है।

हॉलैंड के अनुसार विधिक अधिकार-
अधिकार किसी व्यक्ति में निहित वह क्षमता है।  जिससे वह राज्य की सहमति एवं सहायता से अन्य व्यक्तियों के कृत्यों को नियंत्रित करवा सकता है। हॉलैंड के मतानुसार विधिक अधिकार को राज्य की शक्ति से वैधानिकता प्राप्त होती हैं।

ग्रे के अनुसार विधिक अधिकार-
विधिक अधिकार एक  ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को कोई कार्य करने या कार्य करने से उपरत रहने के लिए वैधानिक कर्तव्य द्वारा बाध्य करता है।

केल्सन के अनुसार विधिक अधिकार-
विधि में अधिकार जैसी कोई संकल्पना नहीं है।इसी प्रकार ड्यूगिट का मानना है कि ”किसी को अपने कर्तव्य को करने के अलावा कोई अधिकार नहीं है।  किंतु ऐसा मानना ‘विधिक अधिकार’ के अध्ययन को सीमित कर देगा।

केल्सन का तर्क है कि कानूनी मानदंड किस हद तक बाध्यकारी हैं। और  उनके विशेष रूप से “कानूनी” चरित्र, क्या है। तथा इसे अंततः कुछ अलौकिक स्रोत जैसे कि भगवान, व्यक्तिगत प्रकृति या अपने समय में बहुत महत्व के बिना पता लगाया जा सकता है।  इसमे  एक व्यक्ति राज्य या राष्ट्र हो सकता है।
सामंड के अनुसार परिभाषा – युक्तता के नियम के द्वारा मान्य और संरक्षित एक हित है। यह एक ऐसा हित है जिसका सम्मान करना एक कर्तव्य और जिसकी अवहेलना करना एक दोष है। अर्थात सामंड के अनुसार किसी अधिकार को न्यायिक रूप में प्रवर्तनीय होना चाहिए और यह कि अधिकार एक हित है।

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सामंड ने सुखा अधिकार को भी बताया है।  वह वैध अधिसेविता है जो एक भूमि खंड में लाभ हेतु अन्य भूमि खंड पर लागू किया जाता है यह वह अधिसेविता  नहीं है जिसे लाभ कहा जाता है।

सुखाधिकार के प्रकार
सुखाधिकार निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं।
 लोक सुखाधिकार
 निजी सुखाधिकार

लोक सुखाधिकार वह अधिकार होता है जिसमें सुखाधिकार जैसा हित रखने वाला व्यक्ति कोई व्यक्ति विशेष या वर्ग विशेष नहीं होकर जनसाधारण होता है।  जबकि निजी सुखाधिकार में ऐसा हित रखने वाला व्यक्ति कोई व्यक्ति विशेष होता है। और  लोग सुखाधिकार सार्वजनिक संपत्ति अथवा अधिकार से संबंधित होता है जो निजी सुखाधिकार निजी संपत्ति एवं अधिकार से होता है ।
इसका एक उदाहरण निर्मला देवी बनाम रामसहाय का मामला है। इसमें विवादित भूमि खुली भूमि थी जिसका वह उस भूमि से लगे मोहल्ले वाले उपयोग करते थे प्रतिवादी इस भूमि के पास ही रहता था विवादित भूमि पर ना तो उसका स्वामित्व और ना ही वह उसकी निजी संपत्ति थी ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा या अभी निर्धारित किया गया कि उस भूमि के उपयोग का मोहल्ले के लोगों का अधिकार है। और वह भूमि से खुली ही रहनी चाहिए।

दायित्व के प्रकार –
सामंड ने दायित्व के निम्न प्रकार बताये है –

सिविल दायित्व –
यह दायित्व दीवानी मामलो की कार्यवाही से सम्बंधित है।  जिसमे प्रतिवादी के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए वादी के जिस अधिकार का उल्लंघन हुआ हैउसको सुना जाता है। तथा  उसका प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाता है।

आपराधिक दायित्व-
आपराधिक मामलो के अंतर्गत किये गए अपराध के लिए अपराधी को दण्डित करने से सम्बंधित कार्यवाही आपराधिक दायित्व कहलाती है।

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उपचारात्मक दायित्व-
जब कभी किसी कानून का निर्माण होता है तो उसके साथ कुछ कर्तव्यों का भी सृजन होता है।और उन करत्वों को पूरा करना होता है।  इसमे यदि कर्तव्यों का निर्दिष्ट पालन न होने की दशा में क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है तो वह इस कानून के अंतर्गत किया जाता है।
उपचारित दायित्व  कानून के अंतर्गत क्षतिपूर्ति के किये बाध्य होता है। उपचारित दायित्व के अंतर्गत राज्य अपनी प्रभुता शक्ति का इस्तेमाल करके कानून का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन करने में सक्षम होता है।

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