विधि शास्त्र के अनुसार वस्तु क्या होता है?

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे विधिशास्त्र संबंधी कई पोस्ट का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की पोस्ट  समझने मे आसानी होगी।

हम कह सकते है की वस्तु एक प्रकार का निर्जीव पदार्थ या उत्पाद है।  जिसे मुद्रा अथवा सेवाओं के बदले प्राप्त किया जा सकता है।
हमारे दैनिक जीवन मे वस्तु का बहुत महत्व है और यह मानवीय क्रिया से जुड़ी हुई होती है और हम इसका प्रयोग करते है।

वस्तु किसी भी प्रकार की हो सकती है। और कुछ भी हो सकता है।  जैसे-अलमारी कूकर बल्ला आदि या फिर खाने का सामान जैसे माइक्रोनी  खीर चाऊमीन मोमोज पूरी  आदि इन सबको हम पैसे देकर या सेवा के बदले ले सकते है।

भूख लगने पर हम खाना खाते है। प्यास लगने पर पानी पीते है । बैठने के लिए कुर्सी का प्रयोग करते है। यह सभी वस्तु है। यह हमारी आवश्यकताओं की तुष्टि करती है।

जो वस्तु अधिक उपयोगी होती है, उसकी मांग अधिक होगी तथा कम उपयोगिता वाली वस्तु की मांग कम होगी।
एक वस्तु किसी भी भौतिक वस्तु को दर्शाती है। जिसका अपना आंतरिक मूल्य होता है।  और यह धन या अन्य वस्तुओं और सेवाओं के लिए आदान-प्रदान किया जा सकता है। निवेश और व्यापार के संदर्भ में वस्तुओं में ईंधन, कृषि उत्पाद और धातु आदि शामिल होतेहै।  

वस्तुओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है।

1.कृषि: अनाज, मक्का, चावल, गेहूं ,चावल

2.कीमती धातुएं: सोना, चांदी,हीरा ,मोती  और प्लैटिनम

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3.ऊर्जा: कच्चे तेल, ब्रेंट क्रूड और अक्षय ऊर्जा,सौर ऊर्जा  

4.धातु और खनिज: एल्यूमीनियम, लौह अयस्क, सोडा

5.सेवाएं: ऊर्जा सेवाएं, खनन सेवाएं

विधिशास्त्र मे विधि को वस्तु मानी गयी है।

विधि शब्द का अर्थ ( Meaning of law )-

सामान्य अर्थ मे यह कहा जा सकता है की कोई भी नियम विधि है।विधि शब्द की  उत्पत्ति की दृष्टि से ‘विधि’ का अंग्रेजी पर्याय ‘लॉ’ टायटोनिक धातु ‘लैग’ से निकला है जिसका अर्थ है कोई ऐसी वस्तु जो एकसार हो अर्थात बंधी हुई हो।

इहरिंग ,स्टैमलर ,ड्यूगिट ,कोहलर तथा  जेनी और अनेक अमरीकी विधि शास्त्रियों ने सजीव विधि, सतत् परिवर्तनीय विषयवस्तु के साथ विधि, आवश्यकताओं और हितों, सामाजिक बलों तथा प्रक्रिया के संदर्भ में विधि को बताया है उन्होने भी माना है की विधि एक विषय वस्तु है।
वास्तव में विधिशास्त्र एंव विधि के सिद्धान्त में अन्तर मात्र विचार का तथा भ्रम पर आधारित है। क्योंकि दोनों की विषयवस्तु, ध्येय और उद्देश्य अलग नहीं है। दोनों में किया जाने वाला अन्तर मात्र अनुभूति तथा क्षेत्र का है।  विषयवस्तु का नहीं। दोनों सामान्य तौर से विधि की प्रकृति, विधि को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तत्वों और विभिन्न विधिक अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों के मूल्यांकन की तरीकों की दृष्टि से समान प्रभाव रखता है।

विधिशास्त्र  एक वस्तु पर शक्ति है। जो इस अधिकार के माध्यम से उस व्यक्ति की उस व्यक्ति की इच्छा के अधीन किया जाता है जो उस अधिकार का उपभोगकर्ता है।

विधि में मानव को भावनात्मक संबल प्रदान करने व प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुख-सुविधाओं के सम्यक उपभोग हेतु समान अधिकार है। विधि द्वारा मानवीय हित में संरक्षित यह विधा ही “प्राकृतिक विधि” कही जाती है। आल्पियन: “दैवी और मानवीय वस्तुओं का ज्ञान, उचित एवं अनुचित वस्तुओं का विज्ञान”है

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सामण्ड के अनुसार –

विधिशास्त्र के अध्ययन की अपनी आभ्यांतरिक रूचि है जिसके कारण इसकी तुलना किसी गंभीर तथा आल्पियन: “दैवी और मानवीय वस्तुओं का ज्ञान, उचित एवं अनुचित वस्तुओं का विज्ञान है।

यह माना जाता है कि विज्ञान के ‘ज्ञान-भण्डार’ के बजाय वैज्ञानिक विधि विज्ञान की असली कसौटी है। या प्रकृति में उपस्थित वस्तुओं के क्रमबद्ध अध्ययन से ज्ञान प्राप्त करने को ही विज्ञान कहते हैं। या किसी भी वस्तु के बारे में विस्तृत ज्ञान को ही विज्ञान कहते हैं। और विधि शास्त्र वस्तुओं का विज्ञान है।

विधिशास्त्र की विषय-वस्तु-

विधिशास्त्र की विषय-वस्तु  में विधि तथा उससे सम्बन्धित विभिन्न संकल्पनाओं का समावेश है।  दूसरे शब्दों मेंयह कह सकते है की  इस शास्त्र के अन्तर्गत विधि की प्रकृति और उसके विभिन्न तत्वों की विवेचना की जाती हैं।

 हम विज्ञान शब्द का प्रयोग इसे अधिक से अधिक व्यापक रूप में करे तो इसमें बौद्धिक अनुसंधान के किसी भी विषय का ज्ञान हो जाए तो हम यह भी  कह सकते हैं कि विधिशास्त्र देश के साधारण कानून का विज्ञान है।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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