विधिक व्यक्ति क्या होता है। विधि शास्त्र के प्रकार का विस्तृत अध्ययन


विधिक व्यक्ति –

विधि शास्त्र के अनुसार विधिक व्यक्ति वह व्यक्ति अथवा विषय वस्तु हो सकता है, जो सामान्य मानव द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को करने में समर्थ है। इसका अर्थ सामान्य रूप में परिभाषित व्यक्ति की परिभाषा से विस्तृत है।

इसको विस्तार से व्याख्यायित करने के लिए व्यक्ति के दो प्रमुख स्वरूप को जानना आवश्यक है जो इस प्रकार से है।

प्राक्रतिक व्यक्ति

विधिक व्यक्ति

विधिक व्यक्ति से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसको विधि ने माना है और यह प्राकृतिक व्यक्ति से भिन्न है। व्यक्ति का संबोधन व्यक्तित्व के रूप मे किया जाता है। इसका अस्तित्व विधि द्वारा प्रदान किया जाता है।

यह यूनानी शब्द से प्रेरित है जिसका अर्थ होता है मुखौटा अर्थात व्यक्तित्व शब्द से मतलब व्यक्ति द्वारा विधिक रूप से मुखौटा पहनने से है। जैसे कोई निगम आदि।

सभी व्यक्ति को विधिक व्यक्ति नही माना जाता है।

प्राचीन काल मे दास और सन्याशी को व्यक्ति नही मानते थे। और गर्भस्थ शिशु को तब तक व्यक्ति नही माना जाता था जब तक कि उसका जन्म न हो गया हो। क्योंकि उनके विधिक अधिकारों से उनको वंचित माना गया था।

अधिकतर यह माना जाता है कि अधिकार जन्म से शुरू होकर मृतु पर ख़त्म हो जाता है। जैसे कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 416 के अनुसार यदपि व्यक्तित्व मृतु के साथ समाप्त हो जाता है परंतु वह व्यक्ति के शरीर पर मन पर प्रभाव डालता है।

जैसे की किसी गर्भस्थ महिला को फाँसी की सजा तब तक स्थगित कर दी जाती है जबतक की उसके बच्चे का जन्म नही हो जाता है।

क्योंकि उसके बच्चे का अधिकार नही छिना जा सकता है।

जब किसी इकाई को जो मानव प्राणी से भिन्न होता है उसको  अधिकार प्रदान कर उसको एक स्वरूप प्रदान किया जाता है तो वह विधिक इकाई कहलाती है।

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ऐसा किया जाना उस समय अनिवार्य माना जाता है जब कोई कंपनी या संकाय मानव जीवन के बीच कोई व्यापारिक आर्थिक विवेचना करती है।

जब कोई संस्था या कंपनी अपना अस्तित्व बनाए रखती है और लोंगों के बीच कार्य करती है।

सामंड के अनुसार –

एक विधिक व्यक्ति मानव जीवन से अलग है जिसको विधि शक्ति प्रदान करती है और मानव की भाति ही उसको अस्तित्व प्रदान करती है। वह एक इकाई के रूप मे कार्य करता है। विधि द्वारा उसको एक काया दिया जाता है और विधि उसका मानवीकरण करती है।

वस्तु को व्यक्तित्व तब प्रदान किया जाता है जब वस्तु विधि की सभी शर्तें पूरी करती है।

यह एक इकाई संकाय और संस्था हो सकती है।

प्रदूम्म दास के एक वाद मे बताया गया है कि हिन्दू धर्म के अनुसार मूर्ति को एक विधिक व्यक्ति माना गया।

देवकी नाथ वाद मे बताया गया कि धार्मिक मूर्ति देव प्रतिमा का कोई हित नही होता वास्तविक हित पुजारी का होता है।

मस्जिद के विरुद्ध वाद नही लाया जा सकता है क्योंकि वह एक क्र्तिम व्यक्ति है।

जीवित व्यक्ति के अंतर्गत व्यक्ति कंपनी निकाय आदि आते है चाहे वह नियमित  हो या नही। पंजीकरण समिति या भी विधिक व्यक्ति के अंतर्गत आती है।

कई ऐसे सिधान्त बनाए गए है जो विधिक विधियो के प्रकृति और संरचना को बताते है परंतु किसी को भी पूर्ण नही बताया गया है।

विधि शास्त्र के प्रकार का विस्तृत अध्ययन –

Kind of jurisprudence –

विधि शास्त्रियों के अनुसार विधि शास्त्र को कई भागो मे बाटा गया है।

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ऑस्टिन ने विधि शास्त्र को 2 भागों मे बाटा है।

सामान्य विधि शास्त्र

विशिस्ट विधि शास्त्र

सामान्य विधि शास्त्र – इस विधि शास्त्र के अनुसार इसको सैद्धांतिक विधि शास्त्र भी कहा जाता है। इसमे उन सभी उद्देश्य सिधान्त और विभेद का वर्णन रहता है जो सभी विधि शास्त्र मे समान रूप से पाये जाते है। इसको सुस्पस्ट विधि भी कहा जाता है। और इसको सुस्पस्ट विधि का दर्शन भी कहा जाता है।

विशिस्ट विधि शास्त्र- यह विधि के किसी एक भाग की वास्तविक विधि का विज्ञान है। यह एक संकीर्ण विज्ञान है। इसमे वर्तमान और भूत प्रणाली का अध्ययन किया जाता है। जो किसी राष्ट  विशेष तक सीमित होती है। इसलिए इसको राष्ट्रवादी विचारधारा भी कहा जाता है।

सामंड द्वारा विधि शास्त्र का वर्गीकरण –

सामंड ने विधि शास्त्र को 3 भागों मे बाटा है।

विश्लेष्णातमक विधि शास्त्र

ऐतिहासिक विधि शास्त्र

नैतिक विधि शास्त्र

विश्लेष्णातमक विधि शास्त्र –

इससे आशय विधियो के प्राथमिक सिद्धांतों का विश्लेषण करने से है। इसमे उनके ऐतिहासिक उधम विकास आदि के बारे मे नही बताया जाता है। इसमे नैतिक विधियो का निरूपण नही किया जाता है।

इसका विकास जॉन ऑस्टिन ने किया था।

ऐतिहासिक विधि शास्त्र –

विधिक पद्धति के प्राथमिक सिद्धांतों और आधार भूत संकल्पनाओ के इतिहास को  ऐतिहासिक विधि शास्त्र कहा जाता है। सबसे पहले सैविनी ने एतिहासिक द्रस्टीकोण अपनाकर इसका सूत्र पात्र किया। सिर हेनरी मैन को ऐतिहासिक विधि शास्त्र का संस्थापक  माना जाता है। इसका उद्देश्य इसका विकास तथा विधि को प्रभावित करने वाले कारको के समान्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करना है।

नैतिक विधि शास्त्र –

इसका मुख्य कार्य विधि कैसे होनी चाहिए है। विधि पहले कैसे थी उससे मतलब नही होना चाहिए। नैतिक विधि से यहा संबंध ये नही कि इस समय क्या कानून हैं आगे क्या कानून था या अब कौन सा कानून लागू होगा। बल्कि इसका संबंध है कि जो भी आगे कानून लागू ओ वह समाज के हित  मे हो । उसका प्रभाव समाज पर कितना पड़ता हैं। वह नैतिकता पर आधारित होना चाहिए ।

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बेंथम द्वारा विधि शास्त्र का वर्गीकरण –

व्याख्यातमक विधि शास्त्र – यह बताता हैं कि नियम कानून क्या होता हैं ।

निर्णातमक विधि शास्त्र – यह बताता है कि विधि शास्त्र कैसा होना चाहिए।

इसको भी 2 भाग मे विभाजित कर दिया गया।

प्राधिकारिक विधि शास्त्र – इसको विधान द्वार शक्ति दी गयी होती हैं ।

अप्राधिकारिक विधि शास्त्र – ये समाज के अनुसार नियम कानून बनाता हैं । यह विधिक साहित्य से अपनी सामग्री प्राप्त करता है।

अब हम देखते हैं कि अप्राधिकारिक को भी 2 भाग मे विभाजित किया गया ।

स्थानीय अप्राधिकारिक विधि शास्त्र – इसमे किसी देश और विदेश दोनों का विधि और साहित्य का वर्णन विस्तार पूर्वक होता हैं।

सार्वभौमिक अप्राधिकारिक विधि शास्त्र- इसमे सम्पूर्ण देश का इतिहास और विधि का ज्ञान निहित होता हैं।  

समाजशास्त्री विधि शास्त्र –

 यह समाज के हितो का विधि शास्त्र भी कहा जाता है। इलिंग के अनुसार कानून न स्वतंत्र रूप से विकसित है। और न ही यह राज्य कि मन मानी दें है। यह विवेक पर भी आधारित नही होता है। इसका उद्देश्य विधि विरोधी भी नही है। यह समन्वय और एकरूपता स्थापित करने का एक रूप है।

तुलनातमक अध्ययन –

इसमे अलग अलग विधियो को आपस मे तुलना की जाती है। और सर्वश्रेष्ठ विधि का निर्माण किया जाता है।

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