विधि शास्त्र के अनुसार आधिपत्य क्या होता है?

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे विधिशास्त्र संबन्धित कई पोस्ट का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की पोस्ट समझने मे आसानी होगी।

इसके अनुसार आधिपत्य का अभिप्राय उस भौतिक अधिकार से होता है, जिसे एक बार प्राप्त किया जा चुका है एवं पुनः उसे इच्छानुकूल उपस्थित किया जा सकता है।आधिपत्य अधिपति होने की अवस्था या भाव को दर्शाता है। जब किसी वस्तु पर प्राप्त होनेवाला ऐसा अधिकार जो किसी को उस वस्तु के संबंध में सब कुछ कहने में समर्थ करता हो तो वह आधिपत्य के अंतर्गत आता है।

जब किसी स्वामीविहीन क्षेत्र में प्रवेश करके उस पर अपनी राजसत्ता स्थापित किया जाता है या फिर दीर्घकाल तक ऐसे भूभाग पर अपनी वास्तविक प्रभुसत्ता बनाए रखना जिसके वैध स्वामी का पता न हो अथवा जिसके मूल स्वामी ने वहाँ स्थापित प्रभुसत्ता के विरूद्ध कोई आपत्ति न की हो अथवा दीर्घसमय से आपत्ति करना बंद कर दिया हो तो यह सब आधिपत्य के अंतर्गत आता है।

फिन्च के अनुसार –

चाहें विधिशास्त्र का अर्थ विधिक अवधारणाओं या संकल्पनाओं, अधिकार, अधिपत्य, स्वामित्व, निगम आदि का अध्ययन माना जाता है। चाहे विधिक सिद्धान्त का तात्पर्य स्वयं विधि का अध्ययन माना जा सकता है। दोनों में समानता है।

ग्रामसी ने कोई क्रमबद्ध राजनीतिक सिद्धान्त पेश नहीं किया है। फिर भी उन्होने आधिपत्य को अच्छे से समझाया है। लेकिन फिर भी उसके राजनीतिक विचार ‘Prison Notes’ के रूप में व्यावहारिक धरातल पर काफी लोकप्रिय हैं। उसके ऐतिहासिक भौतिकवाद, बुद्धिजीवियों की अवधारणा, प्रभुत्व, राजनीति, राज्य और समाज तथा क्रांति आदि सम्बन्धी विचार उसके महत्वपूर्ण विचार रहे है।

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राजनीति दुनिया की सबसे अजीब और सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक हैआधिपत्य जो किसी देश या बातचीत का सही ढंग से नेतृत्व करने के लिए, वांछित परिणाम के उद्देश्य से बहुत सारे प्रयास करना आवश्यक है। राजनीतिक गतिविधि में एकाग्रता की आवश्यकता होती ह। जहा तार्किक रूप से सोचने और जल्दी से प्रतिक्रिया करने की क्षमता। वे देश और लोग जो इन सभी गुणों को एक ही में मिलाने का प्रबंधन करते हैं और उनका प्रभावी ढंग से उपयोग करते हैं उनमें कुछ श्रेष्ठता है। इससे पहले कुल द्रव्यमान के इस तरह के चयन के इतिहास में आधिपत्य कहा जाता है

सैविग्नी का सिद्धान्त के अनुसार –

सैविग्नी के मतानुसार आधिपत्य का प्रमुख लक्षण अन्य व्यक्तियों को भौतिक शक्ति के द्वारा अलग रखना है। आधिपत्य के प्रारम्भ से सम्बन्धित भौतिक अधिकार किसी वस्तु पर वास्तव में अपना ही अधिकार रखना एवं व्यक्तियों को उस वस्तु के उपभोग से अलग कर देना होता है।

बेंथम के अनुसार-

जिस कार्य से मनुष्य को सुख मिलता है वही कार्य उपयोगी और उचित होता है । तथा जिस कार्य से उसे दुख मिलता है। वही अनुपयोगी और अनुचित होता है। इसके आधार पर ही यह कहा जाता है कि उपयोगितावाद का सुखवाद से घनिष्ठ जुड़ाव है। इसलिए उपयोगितावाद को एक सुखवादी माना जाता है।उपयोगितावाद के कारण राजनीतिक सिद्धांत मुख्य रूप से बेंथम के’तर्कबुद्धिवादी दृष्टिकोण” केअनुसार वह अपने प्रयोग से और सत्ता पर आधिपत्य जमाए लोगों के “अनर्थकारी स्वार्थों” के प्रति अपना तर्क दिये थे।

सामंड के अनुसार-

”अधिकार युक्तता के नियम के द्वारा मान्य और संरक्षित एक हित है। यह एक ऐसा हित है जिसका सम्मान करना एक कर्तव्य और जिसकी अवहेलना करना एक दोष मात्र है। अर्थात सामंड के अनुसार, किसी अधिकार को न्यायिक रूप में प्रवर्तनीय होना चाहिए और यह कि अधिकार एक हित है।
जब किसी समूह का अन्य समूहों के उपर राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक या सामाजिक दबदबा मौजूद हो तो इसे प्राधान्य या वर्चस्व या आधिपत्य भी कहते है।

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आधिपत्य अर्जित करने के 3 रूप है।

ग्रहण द्वाराआधिपत्य –

इस आधिपत्य मे वस्तु का कब्जा पूर्ववर्ती कब्जाधारी की सहमति के बिना प्राप्त किया जाता है।इसमे कोई भी व्यक्ति दूसरे की संपत्ति पर कब्जा कर लेता है।

परिदान द्वारा –

जब किसी वस्तु का कब्जा पूर्व कब्जाधारी की सहमति एवं सहयोग से प्राप्त किया जाता है तो उसे परिदान द्वारा अर्जन कहा जाता है।इसमे कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति अपनी सहमति से दूसरे व्यक्ति को दे देता है। रोमन विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति अन्तरण सम्बन्धी करार की एक अनिवार्य औपचारिकता परिदान से संबन्धित थी कि उस संपत्ति के कब्जे का परिदान (delivery of possession) किया जाना आवश्यक था। सम्पत्ति के कब्जे के परिदान को रोमन विधि में ‘ट्रैडीशियो’ कहा जाता है।

विधि के प्रवर्तन द्वारा –

जब विधि के प्रवर्तन द्वारा किसी वस्तु या संपत्ति के कब्जे का अंतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होता है। तो उसे विधि के प्रवर्तन द्वारा अर्जन कहा जाता है।विधि के अन्तर्गत कब्जे को स्वामित्व का प्रथमदृष्ट्या प्रमाण माना जाता है यदि कोई व्यक्ति किसी के कब्जे में दखल देता है। तो यह माना जाता है की उसे उस सम्पत्ति पर अपना हक सिद्ध करना होगा या कब्जाधारी से अधिक प्रबल-अधिकार साबित करना होगा। यदि वह ऐसा सिद्ध नहीं कर पाता की यह संपत्ति उसकी है तो उस सम्पत्ति का स्वामित्व कब्जाधारी में ही होगा।

राज्य द्वारा-

सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए निजी संपत्ति को अधिग्रहण करने की शक्ति उसकी संप्रभु शक्ति है। जो की राजनीतिक आवश्यकताकी इस अधिकार की जननी है। और यह अधिकार दो प्रसिद्ध सूत्रों पर आधारित है। जो की इस प्रकार से है लोकहित ही सर्वोच्च विधि है और दूसरा सूत्र है लोकहित व्यक्तिगत हित की अपेक्षा बड़ा है।

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आधिपत्य के अनुसार अधिकार शून्यता का अर्थ है अधिकार का ना होना। कर्तव्य का अर्थ है स्वतंत्रता का ना होना। निर्योग्यता का अर्थ शक्ति का ना होना। अधीनता का अर्थ उन्मुक्ति का ना होना आदि शामिल होता है।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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