विधि शास्त्र के अनुसार विधि शास्त्र के पद्धतियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन

methods of jurisprudence

विधि शास्त्र के अनुसार विधि शास्त्र के पद्धतियों का विश्लेष्णातमक अध्ययन – जैसा कि हम सभी जानते हैं। देश विदेश मे कई विधिशास्त्री हुए जिन्होने विधि को बड़ी उचाइयो तक पाहुचाया और अपना जीवन इसमे लगा दिया और अपनी अपनी विचार धारा को दुनिया के सामने प्रकट किया आज हम उन्ही विचारधाराओ को आप को समझाने का प्रयास कर रहे हैं।

ऑस्टिन ने विधि शास्त्र को 2 भागो मे विभाजित किया था।

समान्य विधिशास्त्र

विशिस्ट विधिशास्त्र

सामान्य विधिशास्त्र – इसको ही सैद्धांतिक विधिशास्त्र भी कहते हैं इसके अनुसार सभी लीगल सिस्टम यानि कि न्याय प्रडाली मे यह समान्य रूप से पाया जाता हैं । इसको यह भी कह सकते हैं कि यह सभी नियमो कानून मे समान रूप से उत्तरदायी होता हैं।

विशिष्ट विधिशास्त्र – इसके अनुसार यह विधि के संकीर्ण विचारधारा का अध्ययन किया जाता हैं इसमे किसी एक भाग का अध्ययन किया जाता हैं । इसको राज्य विधिशास्त्र भी कहते हैं क्योकि यह केवल राज्यो के एक लीगल सिस्टम का ज्ञान करता हैं।

सामंड ने विधि शास्त्र के बारे मे कहा है कि यह विशेष सबजेक्ट का विज्ञान है। विधि शास्त्र के अनुसार यह विशिष्टृ विज्ञान को तीन रूप मे बाटा जा सकता हैं। 

विश्लेषणातमक

ऐतिहासिक

नैतिक

और अगर इसको वैज्ञानिक रूप से देखने का प्रयास कर रहे हैं तो आप इसको इस तरह भी कह सकते हैं। 

सैधांतिक

ऐतिहासिक

नैतिक

बेंथम के अनुसार

व्याख्यातमक विधिशास्त्र – यह बताता हैं कि नियम कानून क्या होता हैं ।

इसको भी 2 भाग मे विभाजित कर दिया गया।

प्राधिकारिक विधिशास्त्र – इसको विधान द्वरा शक्ति दी गयी होती हैं ।

अप्राधिकारिक विधिशास्त्र – ये समाज के अनुसार नियम कानून बनाता हैं ।

अब हम देखते हैं कि अप्राधिकारिक को भी 2 भाग मे विभाजित किया गया ।

स्थानीय विधिशास्त्र – इसमे देश और विदेश दोनों का विधि और साहित्य का वर्णन विस्तार पूर्वक होता हैं।

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सार्वभौमिक विधिशास्त्र- इसमे सम्पूर्ण देश का इतिहास और विधि का ज्ञान निहित होता हैं।  

निर्णयात्मक विधिशास्त्र – यह बताता हैं कि नियम और कानून किस ततरह से होता हैं ।

ऐतिहासिक विचार धारा 

इसको ऑस्टिन द्वारा विस्तारित किया गया हैं इसलिए इसको ऑस्टिन का सिधांत नाम से भी लोग जानते है। इस स्कूल के अनुसार विधि का आदेश सोवराइन हैं। ये इंग्लैंड मे लागू हुआ इसलिए इसको इंग्लिश स्कूल भी कहते हैं इसमे हर कार्य को सिक्वेंस से किया जाता हैं और इसलिए ही इसका नाम एनालिटिकल स्कूल पड़ गया। इसको हेनरी जी के द्वारा विकशित किया गया।

बेंथम और ऑस्टिन ने इसके विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है। ऑस्टिन बेंथम के सदस्य थे और इनकी बुक प्रकाशित हुई और लोगो के बीच पसंद की गयी। इनके थ्योरी कल्पनाओ पर आधारित थ्योरी को अलग किया। इसमे बताया गया की स्टेट और लॉ एक दूसरे से किस प्रकार जुड़े हुए हैं यह मोरल थ्योरी मे भी संबंध बताता है। उनीसवी शताब्दी मे यह नतुरल थ्योरी को अयोग्य घोसित किया क्योकि इसने बताया था की मनुष्य के अंदर एक प्रकार की ताकत शक्ति होती हैं जो सही गलत का अनुमान लगाती हैं।

क्योकि यह नैतिकता पर आधारित था। बेंथम को एनालिटिकल स्कूल का जनक भी कहा जा सकता हैं। बेंथन ने नैचुरल थ्योरी को गलत बताया हैं इनके अनुसार यह विदान के सिद्धांतों का वर्णन हैं और उसके प्रभाव का जीता जागता नमूना हैं ।  इसमे विधान की सीमाओ का भी वर्णन किया गया हैं जो इसको प्रभावी बनाती हैं ।

विश्लेष्णातमक अध्ययन-

जैसा की नाम से ही स्पष्ट होता हैं विश्लेषणात्मक का अर्थ होता हैं किसी भी चीज का विस्तार से अध्ययन करना यहा पर हम लोग विधान की शक्तियों का अध्ययन करेंगे विधान की मूल अधिकार और मूल शक्तियों का विकास कैसे हुआ। इसका इतिहास क्या हैं और इसका उदगम क्या हैं ।  ये कहा तक जाएगी और इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा इनसब का विस्तार से अध्ययन ही विश्लेष्णातमक अध्ययन कहलाता हैं।

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इसमे हम इसका कई तरह से अध्ययन करते हैं जैसे इसका भाव क्या हैं मौलिक अधिकार मे विधान कहाँ तक उत्तरदायी है। सामान्य भाषा मे बात करे तो कानून को कैसे विश्लेष्णातमक तरीके से जान सकते हैं। कानून के नियम और प्रभाव को विश्लेष्णातमक अध्ययन। देश मे अन्याय का स्तर कितना घटा या बड़ा हैं। इसका कानून के नियम से क्या संबंध हैं इसका आम नागरिक के जीवन मे क्या प्रभाव पड़ेगा। देश के कानून मे इसकी क्या व्यवस्था होगी।  सत्ता किसके अनुरूप चले । विधान का वर्गिकरण कैसे होगा । विधान का वैज्ञानिक रूप क्या होगा आदि का विस्त्रत अध्ययन करना पड़ेगा ।

इसको ऑस्टिन का भी स्कूल कहा जा सकता हैं। ऑस्टिन को इंग्लिश विधिशास्त्र के जनक भी कहा जाता हैं । विधि का संबंध यहा राज्य से होता है  ।इसमे  यदि कोई राजा नही हैं तो विधि शास्त्र  नही होगा इसके अनुसार समाज और उनके नागरिकों का आपस मे संबंध होता हैं। विधि को तीन तत्व के रूप मे पाया जाता हैं। ये तीनों तत्व आपस मे जुड़े हुए हैं जो कि समावेश ,कर्तव्य और अनुशास्त्री है । विधि और राजा का संबंध बहुत अच्छा होता हैं। दोनों मे अटूट प्रेम और विश्वास बना हुआ होता हैं। प्रतेय्क विधि समावेश का रूप है।

प्रोफेसर हार्ट ने ऑस्टिन के इस विचार धारा ओ कहा कि यह तीन चीजों का संगम हैं जो कि आदेश और स्वतंत्र रूप से प्रभुत्व और अनुशास्त्रि है। यह इच्छा का समावेश हैं आप कार्य करोगे या नही आपकी इच्छा क्या कहती हैं यदि नही करोगे तो आपको दंडित किया जाएगा अब आपकी इच्छा क्या कहती हैं यही विचारो का समावेश होता हैं। इसका अपवाद भी होता हैं जैसे कि विधायिका , वह विधि जो बताए निरसन कि शक्ति क्या हैं । वह जो वर्तमान का निर्णय बताती हैं । वह विधिया जो दायित्व को समझती हैं या दायित्व को बताती हैं । यह सब इसके अपवाद के रूप मे कार्य करती हैं।

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नैतिक विधि शास्त्र – जब हम कुछ भी सीखते हैं जिसका असर समाज पर पड़ता हैं । और हम समाज से ही सीखते हैं। इसलिए समाज के अच्छे के लिए हमे समाज मे नैतिक विधि का प्रयोग करना अति आवश्यक हैं । नैतिक विधि से यहा समबंध ये नही कि इस समय क्या कानून हैं आगे क्या कानून था या अब कौन सा कानून लागू होगा। बल्कि इसका सम्बंध है कि जो भी आगे कानून लागू ओ वह समाज के हित  मे हो । उसका प्रभाव समाज पर कितना पड़ता हैं। वह नैतिकता पर आधारित होना चाहिए ।

हमे एक सर्वश्रेस्ठ कानून बनाना हैं । वह हम कैसे बनाएगे हमे यह सोचना हैं। विधि का महत्व तभी होगा जब वह क्या सोचती हैं क्या करना चाहते हैं। इसका निर्धारण कर लेंगे तथा उसके अनुरूप कार्य करेंगे ऐसा कार्य करेंगे जो सबमे आदर्श होगा ऐसे खोज करेंगे जो समाज के हिट मे होगा जिसको समाज के सभी लोंगों द्वारा स्वीकार किया जा सके। सभी उस विधि का सम्मान करे और उसका पालन करे । वह एक आदर्श विधि हो। जिसके द्वारा विधि और न्याय के संबंधो आ पता लगाया जा सकता हो। जो विधि पूर्ण हो। आ विधि के सिद्धांत जिसके द्वारा पता किया जा सके। त्तथा न्याय कैसे मिलेगा इसका पूर्ण रूप से पता किया जा सके । न्याय के लिए जिस चीज कि आवश्यकता हो उसका खोज किया जा सके। 

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