Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) क्या होता है। कंपनी मे इसका क्या महत्व है?

Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम)-

मेमोरंडम ऑफ असोशिएशन यह किसी भी कंपनी का प्रधान प्रपत्र होता है। किसी भी कंपनी के लिए यह महत्वपूर्ण होता है। कोई भी कंपनी इसके बिना रजिस्टर्ड नही हो सकती है। इसको कंपनी की जीवन दायी प्रपत्र भी कह सकते है।

Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम)-

यह कंपनी का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। जो यह बताता है की कंपनी का उद्देश्य क्या है और कंपनी इसको कैसे पूरा करेगी। यह कंपनी अधिनियम के उन शर्तों को भी बताता है जिन शर्तों पर कंपनी का निर्माण किया गया है।

यह कंपनी के कार्य क्षेत्र को बताती है और कंपनी के साथ बाहरी संबंध को भी स्थापित करती है और

कंपनी के साथ समब्न्ध रखते है उनको कंपनी के गतिविधियों की जानकारी देना है। यह बताता है की कंपनी धन को कहा उपयोग करती है और उसकी सीमा क्या है तथा कंपनी कितना रिस्क ले सकती है। और कंपनी की रिस्क की सीमा क्या है। यह सब जानकारी इसमे मिल जाता है।

कंपनी अधिनियम धारा 28 के अनुसार Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम)-

मेमोरंडम ऑफ असोशिएशन का अर्थ संस्था के मूल रूप से बने हुए या किसी पूर्व या कंपनी अधिनियम 1956 के अनुसार बने हुए association ( सीमा नियम) असोशिएशन से है। परंतु यह परिभाषा अपने मे पूर्ण नही मानी जाती है।

इसमे एक वाद इस प्रकार है।

एश्वरी रेलवे कैटेज बनाम रिचे ने केयन्स के अनुसार –

Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम)

मेमोरंडम ऑफ असोशिएशन यह कंपनी का चार्टर होता है और कंपनी सीमा क्या है तथा कंपनी कितना रिस्क ले सकती है। और कंपनी की रिस्क की सीमा क्या है। यह सब जानकारी Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) मे मिल जाता है।

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कंपनी अधिनियम 1956 के अनुसार प्रथम अनुसूची के अनुसार Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) को 4 भाग मे बाटा गया है।

अंश द्वारा सीमित कंपनी

गारंटी द्वारा सीमित कंपनी जिसमे अंश नही है।

गारंटी द्वारा सीमित कंपनी जिसमे अंश पूँजी  है।

असीमित दायित्व कंपनी

Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) को मुद्रित होना आवश्यक होता है। इसको पैराग्राफ के अनुसार अनुच्छेद मे बाँटा गया होना चाहिए। इसको पब्लिक कंपनी मे 7 और प्राइवेट कंपनी मे 2 डायरेक्टर के द्वारा सत्यापित होना चाहिए, तथा सभी सत्यापन केएम से कम 1 सदस्य के द्वारा सत्यापित होना चाहिए। सभी अभिदाता का नाम ,पता ,विवरण आदि लिखा होना चाहिए। सभी सदस्य के द्वारा कम से कम 1 अंश को लिया जाना आवश्यक है। अंश धारी द्वारा जितना अंश लिया जाता है उस अंश धारी के सामने उतने शेयर लिख दिया जाता है।

Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) मे निम्न बातों का होना आवश्यक होता है।

नाम वाक्य –

इसके अनुसार कंपनी कोई भी नाम वाक्य रखने के लिए स्वतंत्र है परंतु इसका ध्यान रखना आवश्यक होता है।

यदि कंपनी अंशो और गारंटी के द्वारा नियमित है तो जब तक धारा 25 के अनुसार बिना लाभ वाली कंपनी मे रजिस्टर्ड नही हुई है तब तक उसको नाम के पीछे लिमिटेड शब्द का प्रयोग करना ।

 । 

केंद्र सरकार के द्वारा चुना गया नाम अवांछनीय न हो।

स्थान वाक्य (रजिस्टर्ड कार्यालय )

सभी कंपनी को कंपनी रजिस्टर्ड करने के 30 दिन के अंदर स्थान वाक्य (रजिस्टर्ड कार्यालय ) स्थापित कर लेना चाहिए तथा इसकी सूचना रजिस्ट्रार को भी देना होता है।

स्थान वाक्य (रजिस्टर्ड कार्यालय ) पर ही कंपनी का सभी दस्तावेज़ रखा जाता है। और वाद विवाद के समब्न्ध मे भी कंपनी का वाद स्थान वाक्य (रजिस्टर्ड कार्यालय ) पर ही किया जाता है तथा पत्र व्योहार भी कंपनी का इसी पता पर होता है। Memorandum of association (पार्षद सीमा नियम) मे भी कंपनी के स्थान वाक्य (रजिस्टर्ड कार्यालय ) का विवरण लिखा होना चाहिए।

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उद्देश्य वाक्य – यह केवल कंपनी की सीमा को ही नही बताता है बल्कि कंपनी के उद्देश्य को भी बताता है। यह कंपनी के उद्देश्य की पूर्ति कैसे होगी यह भी बताता है तथा कंपनी की सीमा भी निर्धारित करता है। यह व्यवहारिक रूप से भी अति महत्वपूर्ण है। यह कंपनी के आंतरिक और वाह्य शक्ति को भी निर्धारित करता है। यह बताता है कि कंपनी धन को कहा उपयोग करती है और उसकी सीमा क्या है तथा कंपनी कितना रिस्क ले सकती है। और कंपनी की रिस्क की सीमा क्या है।

ऐसी कंपनी जो कंपनी अधिनियम 1956 से पहले रजिस्टर्ड हुई है उसमे उद्देश्य वाक्य साधारण रूप से बताया जाता है जबकि ऐसी कंपनी जो कंपनी अधिनियम 1956 के बाद  रजिस्टर्ड हुई है उसमे उद्देश्य वाक्य साधारण रूप से नही  बताया जाता है। बल्कि उसको कई भागो मे विभाजित करके बताते है।

मुख्य उद्देश्य –

इसमे कंपनी के मुख्य उद्देश्य को बताया जाता है।

अन्य उद्देश्य –

इसमे  कंपनी के मुख्य उद्देश्य को छोड़ कर अन्य उद्देश्य को  बताया जाता है। यह उप वाक्य मे ऐसे उद्देश्य आते हैं जो उसमे सम्मलित नही हैं।

यदि किसी कंपनी का विस्तार एक से अधिक राज्य मे है तो सभी का विस्तार से वर्णन करना आवश्यक है।

इसको बनाते समय निम्न तथ्यों का ध्यान रखना आवश्यक है।

कंपनी का उद्देश्य विधि पूर्ण होना चाहिए।

कंपनी का जो भी उद्देश्य हो वह कंपनी का उद्देश्य कंपनी अधिनियम के अनुसार होना चाहिए।

कंपनी का उद्देश्य लोक हित मे होना चाहिए।

कंपनी का उद्देश्य स्पस्ट और निश्चित होना चाहिए।

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कंपनी का उद्देश्य की व्याख्या होनी चाहिए।

दायित्व वाक्य –

सभी अंशो द्वारा सीमित या गारंटी द्वारा सीमित कंपनी के संदर्भ मे एमओए एमई स्पस्ट रूप से लिखा हुआ होना चाहिए। की सदस्यों का दायित्व सीमित है।

सभी सदस्यो की गारंटी भी सीमित होनी चाहिए की कंपनी के समापन के बाद कितना दायित्व रहेगा। एमओए मे किया गया कोई परिवर्तन जिसमे अंशधारी पर जादा अंश लेने का दबाव डाला  जाये जिससे उसके दायित्व मे  हो यह गलत है।

पूँजी वाक्य

सभी अंश पूंजी वाली कंपनी मे अंशो के विभाजन का विवरण होना चाहिए।

असीमित दायित्व वाली कंपनी के संबंध मे भी सभी विवरण एमओए मे दी जानी चाहिए।

सभी सदस्यो की गारंटी भी सीमित होनी चाहिए की कंपनी के समापन के बाद कितना दायित्व रहेगा। एमओए मे किया गया कोई परिवर्तन यदि होता है तो उसका विवरण भी दिया जाना चाहिए।

संघ या अभिदान वाक्य –

इस मे अभिदाता यह बताता है की वह कंपनी बनाने के लिए तैयार है और कोई भी अंश धारी 1 अंश से कम नही लेगा। पब्लिक कंपनी मे 7 और प्राइवेट कंपनी मे 2 सदस्य का होना आवश्यक है। इसमे सभी के हस्ताक्षर होना आवश्यक है।

यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। या इससे संबन्धित कोई और सुझाव आप हमे देना चाहते है।  तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है। 

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