वस्तु विक्रय अधिनियम 1930- एक परिचय

Sale of goods act 1930- an introduction- Hindi Law Notes

वस्तु विक्रय भारत मे लोगो के बीच समनवय का एक स्वरूप है। यह क्रेता और विक्रेता के बीच होने वाले अनुबंध का स्वरूप होता है। यह क्रेता और विक्रेता के मध्य होने वाली सौदेबाजी है। यह 1 जुलाई 1930 को लागू हुआ था। 

वस्तु विक्रय अधिनियम 1930 की धारा 2 मे निम्न परिभाषाओं को बताया गया है। 

क्रेता और विक्रेता-

क्रेता वह व्यक्ति होता है जो सामान को खरीदता है या सामान को खरीदने का वचन देता है। 

विक्रेता वह व्यक्ति होता है जो सामान को बेचता है। या सामान बेचने का वचन देता है। 

क्रेता और विक्रेता दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। क्रेता और विक्रेता वस्तु के विक्रय अनुबंध मे दोनों पक्षों के रूप मे कार्य करते हैं। 

वस्तु और उससे संबंधित अन्य शब्द-

वस्तु से संबंध यहाँ पर चल संपत्ति से है। जिसके अंतर्गत खड़ी फशल , स्टॉक, अंश आदि आते है। तथा इसमे वह भी सम्मलित है जो विक्रय हेतु प्रयोग किया जा सके। मशीनरी के संबंध मे वह जिसको अलग किया जा सके। इसके अलावा रशीद जमा रशीद, ऋण आदि को इसमे सम्मलित किया गया है। 

विद्यमान वस्तुये-

वे वस्तुये जो विक्रय के अनुबंध करते समय उपस्थित है वह विद्यमान वस्तुये कहलाती है। और जो मालिक के स्वामित्व मे है। 

वह माल जो विक्रय के अनुबंध करते समय पहचान लिए गए थे और जिसपर सहमति बनी थी। 

माल विक्रय से समबन्धित विधि को परिभाषित करना और संशोधित करना। इसमे 66 धारा है और 7 भाग मे विभाजित है। यह पूरे भारत मे लागू है।

परिदान-

जब क्रेता कोई प्रतिफल देकर विक्रेता से कोई सामान लेता है तो वह सामान जिसको विक्रेता देता है वह परिदान कहलाता है।

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परिदेय स्थित –

परिदेय यानि कि देने कि स्थित हमेशा विक्रेता के पास माल तैयार नही रहता है। जादा माल लेने के लिए या विशेस माल के लिए पहले से ऑर्डर देना होता है फिर वह माल तैयार किया जाता है यह स्थित परिदेय स्थित कहलाती है।

माल की संपत्ति का अंतरण होना आवश्यक है यहा पर माल का अंतरण और स्वामित्व का अंतरण दोनों होना आवश्यक है। माल विक्रेता के पास रहे और स्वामित्व का आंतरण हो जाये तब भी यह विक्रय के अंतर्गत आता है।

भावी माल –

ऐसा माल जो भविष्य मे दिया जाये भावी माल कहलाता है। जब विक्रेता के पास तुरंत माल उपलब्ध नही है तो वह एक निश्चित धनराशि जमा कराकर एक निश्चित समय पर माल देता है यह भावी माल कहलाता है।

संपत्ति – जब किसी मूल्य के बदले मे कुछ प्राप्त होता है तो वह संपत्ति होती है।

विनिर्दिस्ट माल –

किस माल को किस मूल्य पर बेचना है यह माल अलग कर लेना है यह विनिर्दिस्ट माल होता है।

कीमत मुद्रा के रूप मे होना आवश्यक है। यहा कीमत से अभिप्राय रुपये से है जो प्रतिफल के रूप मे दिया जाता है। यह माल के विक्रय करने से धन के रूप मे प्राप्त होती है।

धारा 4

विक्रय –

जब कोई क्रेता कोई विक्रेता के पास जाकर प्रतिफल देकर माल प्राप्त कर लेना विक्रय होता है।

विक्रय का करार –

जब कोई क्रेता कोई विक्रेता के पास जाकर प्रतिफल देकर माल प्राप्त कर लेना चाहता है परंतु माल उपलब्ध न होने की वजह से विक्रेता उससे कुछ धन लेकर उसको एक निश्चित समय पर माल देने का वचन देता है वह विक्रय का करार होता है।

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विक्रय की संविदा सशर्त होती है-

यह निश्चित संविदा है और इसमे समान के साथ ही कुछ चीजे जुड़ी हुई होती है आपको संपत्ति के साथ उसको भी लेना आवश्यक है।

संपत्ति का विक्रय संविदा के आधार पर होता है –

क्रेता और विक्रेता के मध्य जो संविदा हुई होती है। विक्रय उसके अनुसार ही होता है। कभी भी विक्रय संविदा से हटकर नही होता है।

धारा 5 विक्रय की संविदा – विक्रय लिखित और मौखिक दोनों हो सकती है यह माल देकर या स्वीक्राति द्वारा ही सम्मति से संविदा की जाती है। यह आचरण द्वारा भी किया जा सकता है।

जब तक माल परिदेय स्थित मे न हो विक्रेता द्वारा सारा ख्रच वहन किया जाएगा।

विक्रय के आवश्यक तत्व-

दो पक्षकार-

विक्रय मे 2 पक्षकार होते है एक क्रेता और एक विक्रेता होता है। क्रेता सामान खरीदता है और विक्रेता वह होता है जो सामान को बेचता है।

क्रेता वह व्यक्ति होता है जो सामान को खरीदता है या सामान को खरीदने का वचन देता है। 

विक्रेता वह व्यक्ति होता है जो सामान को बेचता है। या सामान बेचने का वचन देता है। 

क्रेता और विक्रेता दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। क्रेता और विक्रेता वस्तु के विक्रय अनुबंध मे दोनों पक्षों के रूप मे कार्य करते हैं। 

माल-

माल चल संपत्ति होना और उसका मूल्य होना चाहिए। माल से संबंध यहाँ पर चल संपत्ति से है। जिसके अंतर्गत खड़ी फशल , स्टॉक, अंश आदि आते है। तथा इसमे वह भी सम्मलित है जो विक्रय हेतु प्रयोग किया जा सके। मशीनरी के संबंध मे वह जिसको अलग किया जा सके। इसके अलावा रशीद जमा रशीद, ऋण आदि को इसमे सम्मलित किया गया है। 

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प्रतिफल-

प्रतिफल की परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (घ) में दी गयी इसके अनुसार यदि क्रेता जब कोई सामान खरीदता है तो उसके बदले मे जो धन या वस्तु देता है वह प्रतिफल कहलाता है।

स्वामित्व परिवर्तन –

विक्रय मे स्वामित्व परिवर्तन आवश्यक नही है यदि प्रतिफल दे दिया गया है तो वह विक्रय मान लिया जाता है परंतु जायदातर विक्रय मे स्वामित्व का परिवर्तन हो जाता है वह विक्रेता से क्रेता के पास चला जाता है।

विक्रय करार का आवश्यक तत्व-

जब कोई क्रेता कोई विक्रेता के पास जाकर प्रतिफल देकर माल प्राप्त कर लेना चाहता है परंतु माल उपलब्ध न होने की वजह से विक्रेता उससे कुछ धन लेकर उसको एक निश्चित समय पर माल देने का वचन देता है वह विक्रय का करार होता है। जब निश्चित समय पर क्रेता धन देकर और विक्रेता निश्चित समय पर माल क्रेता को दे देता है यह विक्रय करार होता है।

इस प्रकार हमने आपको इस पोस्ट के माध्यम से धारा 1 से 5  तक समझाने का प्रयास किया है यदि कोई गलती हुई हो या आप इसमे और कुछ जोड़ना चाहते है या इससे संबंधित आपका कोई सुझाव हो तो आप हमे अवश्य सूचित करे।

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