Transfer pricing (हस्तांतरण मूल्य निर्धारण) क्या होता हैं। ये कितने प्रकार का होता है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध मे भारतीय Advance Pricing Agreements क्यों किया गया।

Transfer Pricing (हस्तांतरण मूल्य निर्धारण) – देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए  हस्तांतरण मूल्य निर्धारण अति आवश्यक हैं |इसके द्वरा ही कंपनी को अधिक माल बेचने मे सह्यता मिलती हैं | इससे अर्थव्यवस्था सुद्र्ड़ होती हैं |इक उचित कीमत का तरीका अधिक धन प्रदान कर सकता हैं | बड़ी बड़ी कंपनी अपने माल के सप्लाइ के लिए छोटे छोटे व्यापारी को रखती हैं तथा उनसे घर घर माल पाहुचाती हैं और इनको इसके बदले मे कमीशन मिलता हैं |इसका मूल्य निर्धारण समान्य मूल्य की तरह ही होता हैं | इससे अधिक मात्रा मे बचत किया जा सकता हैं और पूंजी लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं |इसका उपयोग और अधिक वितरण तथा साधनो का अच्छे प्रयोग के लिए किया जा सकता हैं| किसी प्रकार से जुड़ी हुई कंपनी के बीच लेन देन को ट्रांफ़र प्राइजिंग कहा जाता हैं इसमे सहायक कंपनी ,माता पिता कंपनी या अन्य जुड़ी हुई कंपनी आ सकती हैं |(ParentCompany) की सब्सिडरी कंपनी या होल्डिंग कंपनी। इसका उद्देश्य है कि एक tranfer pricing हस्तांतरण मूल्य निर्धारण मे बिक्री के समूह में एक कंपनी के लिए एक परिसंपत्ति के मूल्य,और खुले बाजार में एक ही माल की बिक्री मूल्य के बीच विसंगति नही होने चाहिए। सामान्य मूल्य औसत कीमत या विचार खुले बाजार की हालत में तुलनीय वस्तुओं के फीस के रूप मे ली जाती हैं |transfer pricing हस्तांतरण मूल्य निर्धारण सामान्य स्वामित्व या नियंत्रण के तहत उद्यमों के भीतर और उसके बीच मूल्य निर्धारण लेनदेन के नियमों और विधियों को संदर्भित करता है|

इसको ध्यान मे रखते हुए ही सीमा के पार भी कई तरह के समझौते किए गए हैं जिसके अनुसार लेन देन की पूरी जानकारी मिल सके | यह अधिकारियों के मूल्य हस्तांतरण सीमा पार लेन देन रोयल्टी, व्याज और किस्त पर दिये लेन देन का विवरण के साथ आयात और निरयात का ध्यान रखती हैं तथा उसका मूल्य निर्धारण करती हैं | इसमे कुछ ऐसे कंपनीय हैं जो इनरा स्टेट के मूल्य को अपने अनुसार बनाती हैं और सस्ते मे माल बेचती या खरीदती हैं जिससे उन्हे कम तक्ष देना पड़े ऐसे कंपनिया ट्रांफ़र प्राइजिंग के अंतर्गत आती हैं यदि सभी देशो के कर अधिकारियों का आपस मे सामंजस्य हो जाता है तो दोहरे कराधान पर मूल्य हस्तांतरण नीति अपनाई जा सकती हैं और इंटर स्टेट चोरी को कम किया जा सकता हैं |

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हस्तांतरण की कीमतें समग्र संगठन की कर दायित्वों को निर्धारित करने में एक बड़ी भूमिका निभाती हैं। यदि डाउनस्ट्रीम डिवीज़न अपस्ट्रीम डिवीज़न की तुलना में उच्च कर दर के अधिकारक्षेत्र में स्थित है, तो समग्र संगठन के लिए संभव के रूप में उच्चतर अंतरण मूल्य बनाने के लिए एक प्रोत्साहन है। इससे पूरे संगठन के लिए एक समग्र करदो संबंधित कंपनियों के बीच किसी भी तरह के लेन-देन के लिये मूल्य निर्धारण को ट्रांसफर प्राइसिंग कहा जाता हैं | यहा पर संबन्धित कंपनी मूल कंपनी या उसकी सहायक कंपनी हो सकती हैं | यही वजह हैं की जो कंपनिया कई जगह से अपना काम कर रही और तक्ष डिपार्टमेंट मे विवाद चलता रहता हैं वोडाफ़ोन इसका एक अच्छा उदाहरण हैं

यह कंपनीके मुनाफे को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण है, जो कॉर्पोरेट आय कर (आयकर) के कराधान के लिए आधार है। कर आवश्यकता के नियमों कि हस्तांतरण की कीमतों का निर्धारणकरने के लिए निर्धारित विधियों के आधार पर कीमतों में एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी के भीतर या संबंधित दलों के बीच लेन-देन के लिए ध्यान में रखा जाता है।

ऐसे ही मांग और पूर्ति के निवारण के लिए सीबीडीटी ने महत्वपूर्ण फैशला लेते हुए हस्तांतरण नीति को लागू किया और आर्म लेंथ प्राइस को मूल्य निर्धारण के लिए प्रयुक्त माना गया हैं | हस्तांतरण मूल्य निर्धारण transfer pricing 5 प्रकार से होते हैं |

तुलनीय अनियंत्रित मूल्य विधि (Comparable uncontrolled price method) – दो संबंधित कंपनियों के बीच के लेनदेन को नियंत्रित लेनदेन कहा जाता है। इस विधि में नियंत्रित लेनदेन की कीमत, नियमोंऔर शर्तों की तुलना किसी तीसरे पक्ष के लेनदेन के साथ की जाती है। यह दो स्वतंत्र तृतीय पक्ष या करदाता कंपनी और एक स्वतंत्र कंपनी के बीच हो सकता

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Resale price method – जिसमे विक्रेता किसी माल को तिशरे व्यक्ति को बेचता हैं तो उसको पुनः मूल्य निर्धारण विधि कहा जाता हैं | इसपर पुनः विक्रय को ही मूल्य माना जाता हैं और अनियंत्रित विक्रय मूल्य को ही निर्धारित किया जाता हैं | इसमे मार्जिन की गगड़ना अनियंत्रित लेनदेन से होती हैं फिर इसमे मार्जिन को पुनः विक्रय मूल्य से घटा दिया जाता हैं तथा कस्टम ड्यूटि और अन्य ख्रच भी हटा दिया जाता हैं जो मूल्य प्राप्त होता हैं वह हस्तांतरण मूल्य होता हैं |

लागत अधिक विधि (Cost plus method) – इस विधि के अनुसार  बिक्री की लागतों की तुलना प्राप्त लाभ  से की जाती है। जिसमे  सबसे पहले बिक्री के मूल्य का फैसला करना होता हैं जो की लेनदेन से तय किया जाता हैं | इसके बाद लागत तथा मुनाफे के लिए इसको जोड़ना होता हैं जो मिलता हैं वह ट्रांसफर प्राइस होता है

ट्रांजेक्शनल नेट मार्जिन विधि (Transnational net margin method) – इस विधि के अनुसार नियंत्रित लेनदेन के शुद्ध लाभ की तुलना अनियंत्रित लेनदेन से की जाती है। इस तुलना के आधार पर प्राइस तय की जाती हैं।

लाभ विभाजन विधि (The profit split method) – इसमे मुनाफे को लाभ के अनुसार कंपनी के अंदर बाँट दिया जाता हैं और इस प्रकार लाभ को बाँट कर लागत का अनुमान लगाया जाता हैं |

 अंतर्राष्ट्रीय संबंध के अनुसार भारतीय अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौता (Advance Pricing Agreements)

(Advance Pricing Agreements) भारतीय अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौता भारत मे जनवरी 2018 मे किया गया था ।

APA (Advance Pricing Agreements) की आवश्यकता क्यो पड़ी –

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(Advance Pricing Agreements)  का उद्देश्य ट्रांसफर प्राइसिंग के क्षेत्र में मूल्य निर्धारण के तरीकों को ज्ञात कर अंतर रास्टीय जगत मे मूल्य का सही निर्धारण करना था |

किसी भी संबन्धित कंपनियो के बीच लेन-देन के लिये मूल्य निर्धारण को ट्रांसफर प्राइसिंग कहा जाता है।

संबंधित कंपनी से मतलब हैं कि किसी मूल कंपनी (Parent Company) की subsidiary  कंपनी या होल्डिंग कंपनी।

ट्रांसफर प्राइसिंग के सही निर्धारण न होने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कर प्राधिकरणों के बीच विवाद होते रहते हैं।

अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौते के लाभ-

 करदाता को कर मे निश्चितता बनी रहती हैं |

अंतर्राष्ट्रीय मामलो  में विवाद कम होते हैं।

सरकार के कर राजस्व की बढ़ोतरी होती रहती हैं |

देश को विदेशी निवेशकों के लिये मार्ग असान बनाने में सहायता मिलती हैं।

ये समझौते करदाता और सरकार दोनों के लिये ही बाध्यकारी होते हैं। इस कारण शिकायतों और मुकदमेबाजी संबंधी लागतें कम हो जाती हैं।

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