हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार विवाह क्या है। तलाक क्या होता है।तलाक के लिए किन दस्तावेजो कि आवश्यकता होती है।

हिन्दू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act)- हिन्दू कौन हैं इसका सटीक जबाब किसी के पास भी नही हैं । अधिकांश लोग मानते हैं कि हिन्दू धर्म एक जीवन शैली है और उस जीवन शैली को कोई भी, कभी भी, कहीं भी अपना सकता है। उच्चतम न्यायालय ने बहुत पहले माना था कि हिन्दू धर्म एक जीवन शैली है।

हिन्दू को परिभाषित करते हुए गायत्री परिवार ने लिखा हैं की –

हिन्दू उसको कहते हैं जो भारतवर्ष को अपना मात्रभूमि,पित्रभूमि और धर्म भूमि मानता हो।

मात्र भूमि यानि जन्मदाता की भूमि ,जो इसको जन्मदायनी मानता हो।

पित्र भूमि यानि पित्रो की भूमि जो इसको अपने प्रयत्नो की भूमि मानता हो।

धर्म भूमि यानि तीर्थों की भूमि जो इसको तीर्थ भूमि मानता हो वह हिन्दू हैं।

 

हिन्दूओं का मानना है कि हिन्दू धर्म विश्व के सबसे पुराने धर्मो मे से एक हे। यह धर्म सत्य , अहिन्सा,दया, जातीय शुद्धता का संस्कार सिखाता हे। हिन्दू धर्म को सनातन, वैदिक या आर्य धर्म भी कहते हैं। हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। 12वीं शदी के आसपास नागवंश की लिपि जो अब देवनागरी नाम से प्रसिद्ध है में लिपिबद्ध ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया जिससे इरानियों द्वारा सिन्धु को हिन्दू कहा गया।

 

आये अब हम जानते हैं हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार हिन्दू कौन हैं। और यह अधिनियम किस पर लागू होता हैं।

यह अधिनियम हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 कहा जाता हैं।

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इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है और यह उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, अधिवसित उन हिन्दुओं को भी लागू है जो इन राज्यक्षेत्रों के बाहर हों ।

अधिनियम को लागू करना-

ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो हिन्दू धर्म के किसी भी रूप या विकास के अनुसार, जिसके अन्तर्गत शैव, लिंगायत अथवा ब्राह्मो समाज, प्रार्थनासमाज या आर्यसमाज के अनुयागी भी आते हैं. धर्म से  हिन्दू हो;

ऐसा कोई व्यक्ति जो हिन्दू धर्म मे पाला गया हो ,या उसके माँ,बाप हिन्दू हो या फिर, कोई भी अपने आप से या  धर्मज जो उस जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुंब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका वह माता या पिता सदस्य है  अथवा पहले था जो अब इस दुनिया मे नही हैं।

इसमे ऐसा व्यक्ति भी आता हैं जो की हिंदू, बौद्ध, जैन या सिक्ख धर्म में संपरिवर्तित या प्रतिसंपरिवर्तित हो गया हो

ऐ यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो ऐसा कोई भी व्यक्ति उस समय उपलबद  किसी भी बात के बारे में हिन्दू विधि या उस विधि के भागरूप किसी रूढ़ि या प्रथा द्वारा शासित न होता । यहा रूढ़ि” और प्रथा”  शब्द पद ऐसे किसी भी नियम का ज्ञान कराते हैं जिसने दीर्घकाल तक निरन्तर और एकरूपता से अनुपालित किए जाने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुंब के हिन्दुओं में विधि का बल अभिप्राप्त कर लिया हो।

हिन्दू विवाह की शर्ते-

हिन्दू विवाह की मान्य शर्ते धारा 5 मे लिखित हैं | यह हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार दी जाती हैं |

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हिन्दू विवाह की शर्ते क्यो बनाई गयी क्या पहले हिन्दू विवाह नही होता था यदि 1955 के पहले विवाह कैसे होते थे और क्या वह शर्तो का पालन करते थे |

हिन्दू कानून वेद ,पुराण, उपनिषद ,और मनु स्म्र्दि आई और कई पद्यति भी आयी

हिन्दू विवाह के लिए पहले कोई संहिता बद्द तरीका नही था यानि की सब अपने नियम के अनुसार विवाह कर लेते थे | अलग अलग जगह के अपने अपने नियम होते थे और सब उसका पालन करते थे | मनमर्जी तरीके से शादी हो जाती थी जैसे बाल विवाह , मानशिक स्थिति ठीक न होने पर भी शादी कर देना , कोई भी 2 विवाह नही कर सकता हैं |

अब हम जानते हैं इसकी शर्ते क्या हैं |

बाल विवाह

मानशिक स्थिति अच्छी होनी चाहिए

किसी भी प्रकार से अति या पत्नी पहले शादी का जीवित नही होना चाहिए और  अगर वह जीवित हैं तो उनका तलाक हो जाना चाहिए | यदि इसका उलंघन किया गया तो विवाह शून्य होगा | इसमे 7 साल की सजा का भी प्रावधान हैं |

यदि विवाह को छुपा के दूसरी शादी की गयी तो 10 साल की सजा हो सकती हैं |

नाते रिस्तेदार मे शादी नही होनी चाहिए |

माता की 3 गिरती हुई पीढ़ी तक और पिता की 5 पीड़ी तक विवाह नही हो सकता हैं |

अपने पिण्ड यानि सपिंड मे विवाह नही होता हैं | कुछ वेदो के अनुसार यह भाई बहन माने जाते हैं |इसका उलंघन करने पर 1 महीने की सजा दी जा सकती हैं |

धारा 18 के अंतर्गत दंड का उल्लेख किया गया हैं |

धारा 5 के शर्तो को यदि नही माना गया तो विवाह यह तो शून्य होगा नही तो दंडनीय होगा |

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धारा 3 के अनुसार वर 21 का और लड़की 18 की होनी चाहिए जो इसका उलंघन करेगा उसको 2 साल की सजा और 1 लाख का जुर्माना लिया जाएगा | मगर विवाह को वैध मान लिया जाएगा | मगर धारा 18 के अनुसार सजा दी जा सकती हैं |

अगर कोई child मैरेज करता हैं तो यह child marriage एक्ट मे आ जाएगा |

और अगर किसी के यहा लोक हित मे यह मान्य हैं तो विवाह कर सकते हैं |

वर या वधू को किसी को मार्गी का दौरा नही पड़ता हो यानि की दोनों स्वस्थ हो और वह बच्चा पैदा करने के योग्य होना चाहिए | यदि इसका उलंघन होता हैं तो यह शून्यकरणीय विवाह मान लिया जाएगा |

रुड़ी या प्रथा के अनुसार यदि कोई विवाह इसका उलंघन करता हैं तब भी वह विवाह मान्य होगी |

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